Home हिन्दी फ़ोरम सिटीजन सोशल रिस्पांसिबिलिटी – विकास दुबे के एनकाउंटर पर सवाल क्यों ?

सिटीजन सोशल रिस्पांसिबिलिटी – विकास दुबे के एनकाउंटर पर सवाल क्यों ?

16
0
SHARE
सिटीजन सोशल रिस्पांसिबिलिटी - विकास दुबे के एनकाउंटर पर सवाल क्यों ?
 
“जैसी करनी वैसी भरनी” ऐसा ही कुछ हुआ विकास दुबे के साथ, 8 दिन पहले विकास ने 8 पुलिस वालों को मारा था और आठवें दिन पुलिस वालों ने यूपी के मोस्ट वांटेड कुख्यात अपराधी विकास दुबे को एनकाउंटर में मार गिराया। विकास दुबे को गुरूवार को मध्य प्रदेश के उज्जैन महाकाल मंदिर से गिरफ्तार किया गया था और शुक्रवार को जब मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश लाया गया तो विकास दुबे मारा जा चुका था। आठ पुलिस वालों के शहीद होने के बाद लगातार विकास दुबे के गुर्गों की धरपकड़ जारी रही, विकास दुबे की भी बेहद सरगर्मी से तलाश थी, एक एक करके तलाश पूरी होती गयी और गुर्गों समेत विकास दुबे को भी उनके अंजाम तक पहुंचा दिया गया।
2-3 जुलाई की रात से विकास का कांड सामने आया तब से मीडिया का जमावड़ा, बिकरू गांव में रहा, जहां जहां पुलिस जाती मीडिया साथ हो लेती, उज्जैन में भी मीडिया की मौजूदगी में विकास की गिरफ्तारी हुई, मीडिया के कैमरे के सामने भी विकास की हनक दिखाई दी “मैं विकास दुबे हूँ, कानपुर वाला”। उज्जैन में गिरफ़्तारी के बाद यूपी पुलिस पर कई सवाल खड़े हुए, पहले से अपने साथियों को खोने का गम ऊपर से पुलिस पर लांछन कि जब यूपी में पुलिस ही सुरक्षित नहीं तो जनता कैसे सुरक्षित रहेगी। इस सब का सवाल आज पुलिस महकमें ने दे दिया।

कुख़्यात अपराधी के एनकाउंटर पर क्या हमें सवाल उठाना चाहिए ?

मुठभेड़ कैसे हुआ?, विकास दुबे को पुलिस ने कैसे मार गिराया?, माना जा रहा है कि विकास ने उज्जैन में पुलिस को खुद सरेंडर किया तो कानपुर में विकास दुबे क्यों फरार होने की नाकाम कोशिश की?, गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त कैसे हुई?, क्या यूपी पुलिस ने जानबूझकर एनकाउंटर किया है?, क्या पुलिस की विकास दुबे को ठिकाने लगाने की सोची समझी साजिश थी?, क्या एनकाउंटर की पठकथा पहले ही रची जा चुकी थी ? एनकाउंटर में गोलियां सीने पर कैसे लगी ? ये सारे सवाल विकास दुबे की मौत के बाद मीडिया में सुर्खियां है लेकिन हम ये बार बार क्यों भूल रहें हैं कि विकास दुबे एक हिस्ट्रीशीटर था, 60 मामलों में यूपी का मोस्ट वांटेड अपराधी था, फर्जी एनकाउंटर करना भले ही कोई भी अपराधी क्यों ना हो उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन सच्चाई यह भी है कि विकास दुबे ने कई परिवारों को खून के आंसू रुलाया है। कई घरों के चिरागों को बुझाया है, थाने में घुसकर नेता की हत्या की थी, कईयों के जमीन को हथियाया था, ऐसे में कुख़्यात अपराधी के एनकाउंटर पर क्या हमें सवाल उठाना चाहिए?

गैंगस्टर विकास दुबे के मारे जाने की चर्चा, बहस क्यों?

विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता में मानों भूचाल सा आ गया हो, 8 पुलिसवालों की हत्या गुंडों ने की थी, सवाल उस पर उठना चाहिए नाकि पुलिस के कार्रवाई पर। विकास दुबे को लेकर अब तक पुलिस की नाकामी पर यही राजनेता, यही अखिलेश, यही राहुल, यही प्रियंका गांधी सवाल उठा रहे थे, अब जब पुलिस एक्शन में दिखी तो सवाल का रुख़ कहीं और मुड़ गया। हम ये बार बार क्यों भूल रहें है कि विकास दुबे ने 8 पुलिस वालों को बड़े ही निर्ममता से हत्या कर दी थी ऐसे में विकास दुबे के मारे जाने की चर्चा, बहस और पुलिस की कार्यशैली पर सवाल क्यों खड़े किये जा रहें है।

इंसाफ सबके साथ होना चाहिए

विकास दुबे एनकाउंटर में मारे जाने के बाद, 8 पुलिस वाले जो बिकरू गांव में शहीद हुए थे उनके परिवार वालों को इंसाफ तो जरूर मिल गया, लेकिन ये इंसाफ अभी भी अधूरा है, विकास दुबे तो मौत के काल में समां गया लेकिन उन पुलिस वालों का क्या जो अपने ही वर्दी के साथ गद्दारी किये, अपने ही साथियों पर बिल्कुल तरस नहीं खायी, अपने ही पुलिस महकमें के लोगों को विकास की गोलियों से शहीद होने पर मजबूर किया, नौकरी पुलिस की कर रहें थे और काम विकास के लिए मुख़बिरी का किये, कानपुर कांड में मुख़बिरी करनेवाले पुलिस तो सस्पेंड है लेकिन पुलिस प्रशासन को इन पुलिस वालों को भी ऐसी सजा देनी चाहिए कि पुलिस महकमें में एक मिसाल हो। कानून बनाने वाला हो या कानून तोड़ने वाला हो, जब भी कानून हाथ में लिया जायेगा, कानून अपना इंसाफ ऐसे ही करेगा।

सामाजिक जिम्मेदारी निभाएं, शहीद परिवार के मदद के लिए सामने आएं

8 पुलिस वाले अपनी ड्यूटी करते करते शहीद हो गए, आम जनमानस ने इन्हे नम आखों से विदाई दी, सरकार ने भी राजकीय सम्मान के साथ शहीदों को नमन किया, आश्रित परिवार वालों को भरोसा दिलाया कि शहीदों के गुनहगारों को बक्शा नहीं जायेगा और वही हुआ, इस बीच सरकार के साथ साथ ये भी हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है कि शहीदों के परिवार की हम हर संभव मदद करें। कोरोना काल में बिना अपनी जान की परवाह किये यूपी पुलिस और यूपी एसटीएफ पिछले 24 घंटों से लगातार विकास को यूपी लाने की कवायत में जुटी रही, इस बीच इन्हे ना कोरोना का भय है और ना बारिश की चिंता, यूपी पुलिस की पिछले एक हफ्ते से जो किरकिरी हुई अब विकास दुबे की कहानी खत्म होने के बाद जनता पुलिस जिंदाबाद के नारे लगा रही है।
समाज में पनप रहे ऐसे गुंडों का खात्मा हम सब की जिम्मेदारी है, विकास दुबे एकमात्र गुंडा नहीं है, ऐसे कई गुंडों की गुंडई शुरवात में हम बर्दाश्त करते है फिर जाकर राजा भईया, विकास दुबे समाज में पैदा होते है। इनको शुरवात में ही नकेल कसनी चाहिए, सरकार और राजनितिक पार्टियों की शह पर ऐसे गुंडे पनपते है जो समाज के लिए अभिशाप बन जाते है। बहरहाल फर्जी एनकाउंटर किसी भी तरीके से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन सच्चाई ये भी है कि गुंडों और अपराधियों में कानून का खौफ जरूर होना चाहिए। इस बीच विकास दुबे की मौत के बाद सच सदा के लिए दफन हो गया, अब उन सभी नेताओं और पुलिसवालों के पाप धुल गए जो उसके साथी थे, कोई पार्टी अब किसी दूसरी पार्टी पर कोई आरोप नहीं लगाएगी। पुलिस अब किसी जांच को आगे नहीं बढ़ाएगी। विकास दुबे को भ्रष्ट तंत्र ने मिल कर पाला पोसा था, अब सबने मिल कर ही उसका अंत कर दिया।