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March 5, 2026

संथेकुडलूर की अद्वितीय परंपरा: महिलाएं के कपड़े पहन पुरुष करते हैं प्रेम के देवता मनमथा और उनकी पत्नी रति की पूजा

The CSR Journal Magazine

संथेकुडलूर की अनोखी परंपरा

होली का त्योहार रंगों का प्रतीक है, लेकिन कुरनूल जिले के सांथेकुडलूर गांव में इसकी एक अलग ही छवि देखने को मिलती है। यहां, पुरुष महिलाओें की पोशाक में सजते हैं, जो सभी को हैरान कर देता है। इस परंपरा का एक गहरा महत्व है, जो सदियों से चली आ रही है। आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में यह त्योहार कुछ खास तरीके से मनाया जाता है। यहां, पुरुष महिलाओं के कपड़े पहनकर प्रेम के देवता मनमथा और उनकी पत्नी रति की पूजा करते हैं, जो तेलुगु फिल्म ‘जंबालाकिडी पंबा’ की याद दिलाता है।

एक अद्वितीय उत्सव की शुरुआत

कुरनूल के सांथेकुडलूर गांव में होली का त्यौहार खास उत्सव के साथ शुरू होता है। इस अवसर पर पुरुष पारंपरिक साड़ी पहनते हैं, जिससे उनकी आस्था को व्यक्त किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन पुरुष ऐसा इसलिए करते हैं ताकि वे अपने और अपने गांव के लिए शुभता और समृद्धि की कामना कर सकें। यह उत्सव दो दिनों तक चलता है और इसके पहले दिन को “काम दहनम” कहा जाता है।

साड़ी पहनकर भजन-कीर्तन करते पुरुष

सांथेकुडलूर के लोग उत्सव के दौरान साड़ी और लहंगा पहनकर भजन गाते हैं। इस दृश्य को देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। शाम को हाथी के जुलूस के साथ इस त्योहार का समापन होता है। मनमथा की पूजा के द्वारा नकारात्मकता को दूर करने और सुखद भविष्य के लिए आशीर्वाद मांगा जाता है। यह एक अनोखा अनुभव होता है, जहां पुरुष महिलाओं के कपड़ों में प्रार्थना और भजन गाते नजर आते हैं।

ग्रामीणों की आस्था और विश्वास

यहां के ग्रामीणों का मानना है कि इस अनोखे अनुष्ठान से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। वे प्रार्थना करते हैं कि अविवाहितों का विवाह हो जाए, निःसंतान लोगों को संतान प्राप्त हो, और फसल अच्छी हो। लोग अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए पुनः साड़ी पहनकर भगवान के दर्शन करने जाते हैं। यह परंपरा न केवल सांथेकुडलूर में बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।

समाज का एकत्व

इस उत्सव में शिक्षित वर्ग से लेकर समाज के सभी लोग शामिल होते हैं। यह परंपरा केवल कपड़ों का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह एक सामूहिक प्रयास है जिसमें कृषि, रोजगार और वाणिज्य में भलाई के लिए आकांक्षाएं व्यक्त होती हैं। गांववासियों का ठोस विश्वास है कि जब तक ये पुरुष साड़ी पहनकर इस आयोजन में भाग नहीं लेते, तब तक गांव की इच्छाएं अधूरी रहेंगी।

आधुनिक युग में परंपरा का महत्व

इसके अलावा, यह अनोखी परंपरा आज भी जीवित है। आधुनिकता के इस दौर में भी लोग अपने पूर्वजों की परंपराओं को मजबूती से संजोए हुए हैं। लोग इस अनुष्ठान को श्रद्धा के साथ मनाते हैं, जो कि इस क्षेत्र की पहचान और इतिहास का हिस्सा बन चुका है। सांथेकुडलूर की यह अनूठी परंपरा हर साल लोगों के लिए एक नई उमंग लेकर आती है।

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