ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामनेई का दूसरी बार ‘अंडरग्राउंड’ होना केवल सुरक्षा का सवाल नहीं, बल्कि ईरान की सत्ता व्यवस्था के भविष्य पर मंडराते संकट का संकेत है। अमेरिकी दबाव, आंतरिक विरोध और आर्थिक बदहाली के बीच यह सवाल गहराता जा रहा है कि क्या ख़ामनेई का युग अपने अंतिम दौर में है।
क्यों अंडरग्राउंड हुए ख़ामनेई
86 वर्षीय आयतुल्लाह अली ख़ामनेई बीते सात महीनों में दूसरी बार सार्वजनिक जीवन से लगभग गायब हो गए हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और ईरान में बढ़ते प्रदर्शनों ने उनकी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बना दिया है। क़ासिम सुलेमानी, अबू बक्र अल-बग़दादी और हिज़्बुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की हत्या जैसे उदाहरण यह संकेत देते हैं कि क्षेत्रीय राजनीति में अब शीर्ष नेता भी सुरक्षित नहीं रहे। ऐसे माहौल में ख़ामनेई का बंकर में रहना एक रणनीतिक मजबूरी बन चुका है।

36 साल की सत्ता और बढ़ता जन-असंतोष
साल 1989 से सत्ता में रहे ख़ामनेई ईरान के एक बड़े तबके के लिए लंबे समय से नापसंद शख़्सियत रहे हैं। उनके शासन में अमेरिका और पश्चिम विरोधी नीति, कठोर धार्मिक नियंत्रण और परमाणु कार्यक्रम ने ईरान को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में जकड़ दिया। आलोचकों का मानना है कि इन नीतियों की कीमत आम जनता ने महंगाई, बेरोज़गारी और सामाजिक दमन के रूप में चुकाई है। 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद उठे ‘महिला, ज़िंदगी, आज़ादी’ आंदोलन ने यह साफ कर दिया था कि जनता का एक बड़ा हिस्सा अब व्यवस्था से मोहभंग कर चुका है।
सत्ता के भीतर भी दरार?
विश्लेषकों के मुताबिक, ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान पूरी तरह एकजुट नहीं है। येल यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ अर्श अज़ीज़ का कहना है कि शासन के भीतर कुछ हल्के ऐसे हैं जो ख़ामनेई के बाद के दौर की तैयारी कर रहे हैं।
संसद स्पीकर मोहम्मद बाक़र क़ालीबाफ़ और पूर्व राष्ट्रपति हसन रूहानी जैसे नाम संभावित विकल्पों के रूप में देखे जाते हैं, हालांकि सुधारवादी खेमा अब काफी कमजोर हो चुका है। सेंट एंड्रयूज़ यूनिवर्सिटी के अली अंसारी के शब्दों में, “ईरान में अब सुधारवादी नहीं, सिर्फ शासक और शासित बचे हैं।”

सड़कों पर जनता, विदेश में उम्मीद
ईरान की सड़कों पर विरोध का स्वर अब केवल सामाजिक आज़ादी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अर्थव्यवस्था केंद्र में आ गई है। रियाल की गिरती कीमत, व्यापार ठप होना और ऊर्जा संकट ने मध्यम वर्ग और व्यापारियों को भी आंदोलनों में शामिल कर दिया है। इसी बीच, निर्वासन में रह रहे पूर्व शाह के बेटे रज़ा पहलवी का नाम नारों में सुनाई दे रहा है। हालांकि उनकी लोकप्रियता प्रतीकात्मक मानी जाती है, क्योंकि ईरान के भीतर उनका कोई संगठित ढांचा नहीं है। कई प्रदर्शनकारी उन्हें केवल इस्लामी गणराज्य के विरोध के एक चेहरे के रूप में देखते हैं।
क्या विदेशी हस्तक्षेप बनेगा निर्णायक?
प्रदर्शनकारियों का एक वर्ग मानता है कि मौजूदा व्यवस्था का अंत बिना विदेशी हस्तक्षेप के संभव नहीं है। ट्रंप के बयान “मदद आने वाली है” ने इस उम्मीद को और हवा दी है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर ख़ामनेई को अचानक सत्ता से हटाया गया, तो इससे ईरान में अराजकता और गृह संघर्ष बढ़ सकता है।
रिवोल्यूशनरी गार्ड्स अब भी सर्वोच्च नेता के प्रति वफादार दिखाई देते हैं और यही संस्था फिलहाल व्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है।


