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February 16, 2026

महाभारत का युद्ध-विज्ञान उज्जैन में सजीव अवतार में: 100 से ज्यादा अस्त्र-शस्त्र, 14 व्यूह रचनाएं और प्राचीन सैन्य रणनीति का भव्य प्रदर्शन

The CSR Journal Magazine
विश्व के सबसे महान महाकाव्य महाभारत को अब सिर्फ धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय युद्ध-विज्ञान और सैन्य रणनीति के वैज्ञानिक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। मध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में पहली बार ऐसी भव्य शोध-आधारित प्रदर्शनी सजी है, जिसमें महाभारत युद्ध में वर्णित अस्त्र-शस्त्रों और व्यूह रचनाओं को आधुनिक तकनीक और त्रि-आयामी मॉडलों के माध्यम से साकार रूप दिया गया है।

100 से अधिक अस्त्र-शस्त्रों की ऐतिहासिक प्रदर्शनी

महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ परिसर में आयोजित इस प्रदर्शनी में महाभारत काल के 100 से अधिक अस्त्र-शस्त्रों के बड़े और प्रमाणिक मॉडल लगाए गए हैं। इनमें गदा, धनुष-बाण, तलवार, भाला, ढाल, सुदर्शन चक्र और वज्र जैसी प्रतिकृतियां शामिल हैं। ये सिर्फ देखने की वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि इनके साथ उनके उपयोग की तकनीक, युद्ध-शैली और ऐतिहासिक संदर्भ भी दर्शाए गए हैं।

18 दिन के युद्ध की 14 व्यूह रचनाएं

प्रदर्शनी की सबसे आकर्षक विशेषता है 18 दिन चले महाभारत युद्ध की 14 प्रमुख व्यूह रचनाओं के त्रि-आयामी मॉडल। इन मॉडलों के माध्यम से सेना की संरचना, घेराबंदी की रणनीति, आक्रमण और रक्षा की योजनाओं को वैज्ञानिक ढंग से समझाया गया है। यह प्रस्तुति दर्शकों को उस काल की सैन्य सोच और संगठन क्षमता से सीधे जोड़ती है।

प्राचीन संचार प्रणाली और युद्ध अनुशासन

यहां केवल हथियार ही नहीं, बल्कि युद्ध की पूरी व्यवस्था को समझाया गया है। 45 पताकाएं और 11 शंख प्रतिरूप प्राचीन संकेत प्रणाली को दर्शाते हैं, जिससे उस समय की संचार व्यवस्था, सैन्य अनुशासन और रणनीतिक समन्वय का ज्ञान मिलता है। इसके साथ ही युद्ध आचरण-नियम, रथ व्यवस्था, योद्धाओं की भूमिकाएं और मनोवैज्ञानिक युद्ध की अवधारणाओं को भी विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।

शोध, दृष्टि और उद्देश्य

इस प्रदर्शनी का उद्देश्य महाभारत को केवल धार्मिक आख्यान के रूप में नहीं, बल्कि नीति, कूटनीति, युद्धशास्त्र और सैन्य संगठन के समन्वित ग्रंथ के रूप में स्थापित करना है। आयोजकों के अनुसार, नई पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा और रणनीतिक चिंतन से जोड़ना इसका मूल लक्ष्य है।

14 माह का शोध, 12 लाख की लागत

इस पूरे प्रोजेक्ट के पीछे 14 महीनों का गहन शोध है। इंदौर के शोधकर्ता राज बेन्द्र ने पहले आठ महीने ग्रंथों और ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन कर रूपरेखा तैयार की, फिर छह महीनों में मॉडलों का निर्माण हुआ। लगभग 12 लाख रुपये की लागत से तैयार की गई सभी प्रतिकृतियां आकार, अनुपात और उपयोग विधि के स्तर पर प्रामाणिकता का विशेष ध्यान रखकर बनाई गई हैं।

राष्ट्रीय महत्व और शैक्षणिक भविष्य

इससे पहले इस तरह की पहल भोपाल के भारत भवन में हुई थी, लेकिन अब उज्जैन में इसे स्थायी शैक्षणिक स्वरूप देने की दिशा में प्रयास हो रहे हैं। इतिहासकारों और शिक्षाविदों का मानना है कि यह प्रदर्शनी भारतीय युद्ध-विज्ञान, रणनीतिक सोच और सांस्कृतिक विरासत को अकादमिक विमर्श से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन सकती है।

छात्रों और शोधार्थियों के लिए दुर्लभ अवसर

यह प्रदर्शनी विद्यार्थियों, शोधार्थियों और सैन्य इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए प्राचीन भारत की तकनीकी क्षमता, संगठन कौशल और नीति-आधारित युद्ध पद्धति को समझने का अनूठा अवसर प्रदान कर रही है। यह पहल यह सिद्ध करती है कि महाभारत केवल आस्था का ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय रणनीतिक परंपरा का जीवंत और वैज्ञानिक दस्तावेज भी है।
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