ट्रांसजेंडर कानून पर Supreme Court में चुनौती: क्या छिन जाएगा पहचान का अधिकार?

The CSR Journal Magazine
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका के जरिए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। इस याचिका में 2019 के एक्ट के तहत किए गए बदलावों पर सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और जैनब पटेल का कहना है कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों को कमजोर करता है।

केंद्रीय सरकार पर सवालिया निशान

याचिका में आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार ने हाल ही में जो बदलाव किए हैं, वे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्वयं के लिंग का निर्धारण करने के अधिकार को छीन लेते हैं। त्रिपाठी, जो किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, का मानना है कि यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद-14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन करता है।

परिभाषा में बदलाव का असर

याचिका में रेखांकित किया गया है कि 2019 के संशोधन के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा में जो बदलाव किए गए हैं, वे गंभीर समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं। पुरानी परिभाषा के अनुसार, लैंगिक पहचान व्यक्ति के अनुभव पर आधारित होती थी। लेकिन नए प्रावधानों में इसे सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों और चिकित्सकीय स्थितियों की सूची में बदल दिया गया है।

स्व-पहचान का अधिकार खतरे में

इस परिवर्तन से स्व-पहचान का आधार समाप्त हो सकता है, जिससे कई ट्रांसजेंडर व्यक्ति कानूनी मान्यता से वंचित रह सकते हैं। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि यह स्थिति ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए गंभीर खतरा पेश कर सकती है।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया

नए कानून को लेकर विपक्षी दलों और LGBTQIA+ समूहों ने गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस बिल के मसौदे से पहले उनकी राय नहीं ली गई थी। इसी के चलते नेशनल काउंसिल ऑफ ट्रांसजेंडर पर्सन्स (NCTP) के दो सदस्यों ने बिल पारित होने के दिन अपने पदों से इस्तीफा दे दिया।

सुप्रीम कोर्ट की जांच में नया मोड़

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति ने भी केंद्र सरकार से इस बिल को वापस लेने की सिफारिश की है। यह समिति ट्रांसजेंडर अधिकारों के संरक्षण पर लगातार निगरानी रख रही है। अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या कार्रवाई करता है और संविधान की रक्षा के लिए कौन से कदम उठाता है।

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