फेक इंश्योरेंस पॉलिसी पर Supreme Court की कड़ी सख्ती, SIT जांच की भेजी निर्देश

The CSR Journal Magazine
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है जिसमें नेशनल इंश्योरेंस कंपनी (NIC) के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर को फेक इंश्योरेंस पॉलिसी के मामले में आरोपी बनाने का निर्देश दिया गया है। इस आदेश में कोर्ट ने कहा कि अब समय आ गया है कि इंश्योरेंस कंपनियाँ अपनी जिम्मेदारियों का पालन करें। कोर्ट ने कंपनियों की निष्क्रियता को गंभीरता से लिया है।

फेक पॉलिसी का मामला सामने आया

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) गठित की जाए, जो मामले की जांच करेगी। यह मामला राष्ट्रीय महत्व का माना जा रहा है और इसे एक “टेस्ट केस” के रूप में देखा जा रहा है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने NIC की आलोचना करते हुए कहा कि फेक इंश्योरेंस पॉलिसी के बावजूद कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया गया।

जांच की दिशा में पहला कदम

SIT को निर्देश दिया गया है कि वह एक नया केस दर्ज करे जिसमें NIC के CMD, स्थानीय ब्रांच मैनेजर और अन्य कर्मचारियों को आरोपी बनाया जाए। इस मामले में एक बस के मालिक को भी आरोपी ठहराया जाएगा, जिसके खिलाफ जांच चल रही है। कोर्ट ने जांच टीम से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि केस को जल्द से जल्द ठोस निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।

DGP ने किया माफी का अनुरोध

इससे पहले, कोर्ट ने तमिलनाडु के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया था। DGP से यह भी कहा गया कि वे एक हलफनामे में स्पष्टीकरण दें कि मोटर हादसों के मामले में इंश्योरेंस दस्तावेजों की प्रामाणिकता की जांच करना जरूरी नहीं। इस पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई। DGP ने कोर्ट में पेश होकर बिना शर्त माफी मांगी, जिसे बेंच ने स्वीकार किया।

मामले की जड़ें

यह मामला के. सरवनन से जुड़ा है, जो एक सड़क हादसे का शिकार हुआ था। जब सरवनन को एक बस की टक्कर लगी, उसे गंभीर चोटें आईं। इस हादसे के चलते उसे कई सर्जरी से गुजरना पड़ा और नौकरी भी खोनी पड़ी। सरवनन ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में बीमाकर्ता NIC से मुआवजे का दावा किया था।

बीमाकर्ता का विरोध

जब MACT में मामले की सुनवाई हुई, तो NIC ने दावा किया कि बस की तीसरी पक्ष की इंश्योरेंस पॉलिसी वैध नहीं थी। हालांकि, MACT ने उनके इस तर्क को खारिज कर दिया और NIC को मुआवजे का निर्णय दिया। मामला जब मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा, तो उसने भी MACT के फैसले का समर्थन किया।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में NIC के खिलाफ दिए गए रोक के आदेश को बरकरार रखा और जाँच की सख्ती पर जोर दिया। यह मामला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि आम जन के लिए भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी है कि कैसे इंश्योरेंस कंपनियों को अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए।

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