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March 17, 2026

सुप्रीम कोर्ट में आज उद्योग की परिभाषा पर सुनवाई: 9 जजों की बेंच करेगी फैसला

The CSR Journal Magazine
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच आज से ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा पर सुनवाई शुरू करेगी। यह सुनवाई औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत महत्वपूर्ण मुद्दों पर आधारित है। बेंच की अध्यक्षता CJI सूर्यकांत कर रहे हैं। 16 फरवरी को कोर्ट ने यह तय किया था कि वह उद्योग की परिभाषा, सरकारी संस्थाओं के मामले, NGO/चैरिटी की भूमिका और 1978 के पुराने फैसले की समीक्षा करेगा। इस सुनवाई का नतीजा यह तय करेगा कि किन संस्थाओं पर लेबर लॉ लागू होंगे।

कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं

उद्योग की परिभाषा के तय होने से न केवल विभिन्न संस्थाओं की स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि कर्मचारियों के अधिकार जैसे कि छंटनी, वेतन और यूनियन भी प्रभावित हो सकते हैं। बेंच में CJI सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल हैं। ये जज इस मामले पर 18 मार्च तक सुनवाई करेंगे।

1978 का ऐतिहासिक निर्णय

इस मामले की पृष्ठभूमि 1978 से जुड़ी है, जब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने ‘बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड’ मामले में उद्योग की विस्तृत परिभाषा दी थी। फैसले में यह कहा गया था कि जहां नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध है और कोई सेवा या काम होता है, वह उद्योग हो सकता है। इस परिभाषा के कारण सरकारी विभाग, अस्पताल, स्कूल और NGO भी उद्योग के दायरे में आने लगे और उन पर लेबर कानून लागू होने लगे।

बड़ी बेंच का महत्त्व

मई 2005 में, एक 5 जजों की बेंच ने इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया था ताकि उद्योग शब्द की परिभाषा की व्याख्या पर गहराई से विचार किया जा सके। तब से यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है। 2017 में, तत्कालीन CJI टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बेंच ने कहा था कि इसे 9 जजों की बेंच के सामने लाना आवश्यक है, क्योंकि इस मुद्दे के गंभीर और दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

देश की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर

अब सभी की निगाहें इस महत्वपूर्ण सुनवाई पर टिकी हुई हैं। किस तरह से विभिन्न संस्थाएं श्रम कानूनों के दायरे में आएंगी, इसका फैसला इस सुनवाई से होगा। इस विषय पर बहस के परिणाम न सिर्फ सरकारी विभागों بلکه NGO और चैरिटी संस्थानों के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होंगे।
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