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March 11, 2026

भारत में पैसिव यूथेनेशिया का पहला मामला-सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को दी इच्छामृत्यु की अनुमति

The CSR Journal Magazine

जिंदगी और मृत्यु का बारीक समझौता

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक विशेष मामले में 31 साल के हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति दी है। हरीश पिछले 12 साल से कोमा में हैं और लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर हैं। यह फैसला भारत में अपने प्रकार का पहला मामला माना जा रहा है, जो इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) का अधिकार दे रहा है।

12 साल से कोमा में हरीश

हरीश राणा की हालत बेहद गंभीर है। उनका जीवन पिछले एक दशक से अधिक समय से मशीनों पर निर्भर है। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों, जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन ने स्पष्ट किया है कि राणा की ठीक होने की संभावनाएं लगभग न के बराबर हैं। इस पर उन्होंने दिल्ली के एम्स को निर्देश दिया कि हरीश को पैलियेटिव केयर में भर्ती किया जाए, जो ऐसे मरीजों के लिए आराम देने वाली चिकित्सा है, जिनका इलाज संभव नहीं होता।

एक दर्दनाक हादसे की कहानी

हरीश राणा की कहानी 2013 में शुरू हुई जब वह एक बिल्डिंग से गिरे और उनके सिर में गंभीर चोट आई। तब से, वे कोमा में हैं और उनकी जिंदगी का हर दिन एक कठिन चुनौती है। डॉक्टरों का मानना है कि उनकी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है, जिससे उनके परिवार और मित्रो पर बहुत बड़ा बोझ पड़ा है। इस तरह के मामले में इच्छामृत्यु की अनुमति एक नई बहस को जन्म देती है।

चिकित्सा क्षेत्र में माइलस्टोन सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय केवल हरीश के लिए नहीं, बल्कि समस्त चिकित्सा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है। यह एक नए युग की शुरुआत कर सकता है जहाँ मरीजों के अधिकारों को प्राथमिकता दी जा रही है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राणा की इच्छामृत्यु का अधिकार उनके मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। यह एक ऐसे देश में हो रहा है, जहाँ जीवन की गुणवत्ता और स्वतंत्रता को लेकर चर्चा बढ़ रही है।

 चिकित्सा और नैतिकता पर बहस

इस मामले ने समाज में नैतिकता और चिकित्सा पर बातचीत को एक नया मोड़ दिया है। क्या व्यक्ति को अपनी मृत्यु का निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए? कोर्ट का फैसला इस बहस को और आगे बढ़ा सकता है। राणा के मामले ने एक जटिल स्थिति को उजागर किया है, जिसमें परिवार, चिकित्सा पेशेवर, और कानूनी प्रणाली सभी शामिल हैं।

कानूनी पहलू पर भविष्य की दृष्टि से छिड़ी चर्चा

आगे बढ़ते हुए, देश में इच्छामृत्यु से जुड़े कानूनों को लेकर एक व्यापक चर्चा की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या भारतीय समाज इसके लिए तैयार है। क्या यह फैसला अन्य गंभीर रूप से बीमार मरीजों के मामलों में बहस को आगे बढ़ाएगा? यह देखने वाली बात होगी कि हरीश राणा का मामला भारत के चिकित्सा कानून के विकास में कैसे योगदान देगा।

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