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March 1, 2026

Rajiv Gandhi National University of Law से राजीव गांधी का नाम हटाने का प्रस्ताव पारित, प्रबंधन बोर्ड को भेजा जाएगा

The CSR Journal Magazine
पटियाला की राजीव गांधी नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से पूर्व प्रधानमंत्री का नाम हटाने का प्रस्ताव हाल ही में सामने आया है। अकादमिक काउंसिल ने इस संबंध में प्रस्ताव पेश किया, जिसे अब मैनेजमेंट बोर्ड के पास भेजा जाएगा। इसके बाद अंतिम निर्णय लेने के लिए मामला पंजाब सरकार के पास जाएगा। इस विश्वविद्यालय की स्थापना 2006 में पंजाब अधिनियम के तहत हुई थी, जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी।

विरोध और समर्थन के बीच राजनीतिक प्रतिक्रिया

इस प्रस्ताव पर विभिन्न राजनीतिक दलों से प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। कांग्रेस सांसद डॉ. धर्मवीर गांधी ने इसे अनुचित बताया है। उनका मानना है कि संस्थानों के नाम बदलने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इसके अलावा, कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भी इस परिवर्तन को चुनावी कदम करार दिया, और शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही।

अकाली दल और AAP का समर्थन

वहीं आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के कुछ नेता इस कदम का समर्थन कर रहे हैं। इन नेताओं का कहना है कि 1984 के सिख विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि को देखते हुए विश्वविद्यालय के नाम पर पुनर्विचार करना उचित है। इस विवादित मुद्दे ने अब राजनीतिक गर्मी बढ़ा दी है।

अगले कदम और संभावित परिणाम

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मैनेजमेंट बोर्ड और राज्य सरकार इस प्रस्ताव पर क्या निर्णय लेते हैं। नाम परिवर्तन की प्रक्रिया को लेकर विभिन्न विचार आ रहे हैं, लेकिन अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। विश्वविद्यालय के नाम में बदलाव का निर्णय राज्य की राजनीतिक स्थिति और आगामी चुनावों पर भी निर्भर करेगा।

अधिकारियों की बैठक प्रस्तावित

सूत्रों के अनुसार, विश्वविद्यालय के अधिकारियों की एक बैठक जल्द ही आयोजित की जाएगी, जिसमें इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। यह बैठक महत्वपूर्ण होगी क्योंकि इसमें विश्वविद्यालय के भविष्य को लेकर चर्चा होगी। शिक्षा के क्षेत्र में यह मामला बहुत संवेदनशील है और सभी पक्षों को विचार करने की जरूरत है।

स्थानीय नागरिकों की राय

पटियाला के स्थानीय नागरिकों में भी इस मुद्दे पर बहस चल रही है। कुछ लोग विश्वविद्यालय के नाम परिवर्तन का समर्थन कर रहे हैं जबकि अन्य इसे राजनीतिक प्रपंच मान रहे हैं। शहर के छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय का नाम बदलने से कोई वास्तविक बदलाव नहीं आएगा, जबकि कुछ इसे एक जरूरी कदम मानते हैं।

समाज के विभिन्न तल पर चर्चा

इस विषय पर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में भी चर्चा तेज हो गई है। छात्रों, शिक्षकों और नागरिकों ने अपने विचार साझा किए हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में इस प्रस्ताव पर और क्या प्रतिक्रियाएं आती हैं और क्या यह मामला आगे बढ़ता है।

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