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January 3, 2026

कड़ाके की ठंड, जमीन पर नींद और एक वक्त का भोजन, माघ मेला में कल्पवास की परंपरा आखिर क्यों है इतनी खास?

The CSR Journal Magazine
प्रयागराज की पावन धरती पर हर वर्ष आयोजित होने वाला माघ मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, तप और आत्मशुद्धि की अनूठी परंपरा है। माघ मेला 2026 के दौरान संगम तट पर हजारों श्रद्धालु कड़ाके की ठंड, सीमित साधन और कठोर नियमों के बीच एक महीने तक जो साधना करते हैं, उसे कल्पवास कहा जाता है। यह परंपरा पौष पूर्णिमा से आरंभ होकर माघ पूर्णिमा तक चलती है और हिंदू धर्म में इसे अत्यंत फलदायी माना गया है।

क्या है कल्पवास? जानिए इसका वास्तविक अर्थ

‘कल्पवास’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है—‘कल्प’ यानी समय का एक पवित्र चक्र और ‘वास’ यानी निवास। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संगम तट पर एक निश्चित अवधि तक निवास करते हुए संयमित जीवन जीना ही कल्पवास है। माना जाता है कि इस दौरान व्यक्ति का मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक कायाकल्प होता है। पुराणों में उल्लेख है कि कल्पवास करने से साधक पूर्व जन्मों के पापों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।

पुराणों में वर्णित है कल्पवास की महिमा

पद्म पुराण और मत्स्य पुराण जैसे ग्रंथों में कल्पवास की महत्ता का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि माघ मास में सभी देवी-देवता संगम क्षेत्र में निवास करते हैं। ऐसे में यहां रहकर गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में स्नान और पूजा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि श्रद्धालु अपने घर-परिवार को छोड़कर संगम तट पर तंबुओं में निवास करते हैं।

आत्म-शुद्धि से लेकर मोक्ष तक का मार्ग

कल्पवास केवल नदी किनारे रहना नहीं है, बल्कि यह इंद्रियों पर नियंत्रण और आत्म-शुद्धि की प्रक्रिया है। नियमित गंगा स्नान, सात्विक भोजन और संयमित दिनचर्या से मन और शरीर दोनों शुद्ध होते हैं। धार्मिक विश्वास है कि जो साधक नियमपूर्वक कल्पवास पूर्ण करते हैं, उन्हें जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कठोर नियम, लेकिन अटूट आस्था

कल्पवासी को एक अनुशासित जीवन जीना होता है। वे दिन में केवल एक बार सादा और सात्विक भोजन करते हैं। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर दिन में तीन बार संगम स्नान, पूजा-पाठ और जप-ध्यान अनिवार्य होता है। बिस्तर और पलंग का त्याग कर जमीन पर पुआल या चटाई पर सोना पड़ता है। साथ ही क्रोध, झूठ, निंदा, लोभ और भोग-विलास से पूरी तरह दूरी बनाई जाती है।

क्या करें और क्या न करें: कल्पवास की मर्यादा

कल्पवास के दौरान साधक को अधिक से अधिक समय सत्संग, प्रवचन और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में बिताना चाहिए। दान, सेवा और जरूरतमंदों की सहायता को पुण्यदायी माना गया है। वहीं, मेला क्षेत्र छोड़ना, तामसिक भोजन, नशा, अनावश्यक दिखावा और मोबाइल का अत्यधिक उपयोग वर्जित होता है। यह अवधि आत्मसंयम और सादगी की परीक्षा होती है।

मानसिक और शारीरिक लाभ भी कम नहीं

धार्मिक महत्व के साथ-साथ कल्पवास के कई व्यावहारिक लाभ भी माने जाते हैं। नियमित दिनचर्या, सीमित भोजन और प्रकृति के करीब रहना मानसिक शांति देता है। रेत या जमीन पर सोना अर्थिंग थेरैपी की तरह काम करता है, जिससे शरीर में संतुलन और ऊर्जा का संचार होता है।

आस्था की पराकाष्ठा है कल्पवास

माघ मेला 2026 में कल्पवास सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या और आत्मअनुशासन का जीवंत उदाहरण है। यही कारण है कि हर साल लाखों श्रद्धालु कठिनाइयों के बावजूद संगम तट पर पहुंचते हैं और एक महीने तक स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देते हैं। यह साधना जीवन को सरल, संयमित और आध्यात्मिक बनाने का मार्ग दिखाती है।
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