Kashi: वाराणसी संसार के प्राचीनतम बसे शहरों में से एक और उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध नगर है। इसे ‘बनारस’ और ‘काशी’ भी कहते हैं। काशी को हिन्दू धर्म में सर्वाधिक पवित्र नगरों में से एक माना जाता है और इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। इसके अलावा बौद्ध एवं जैन धर्म में भी इसे पवित्र माना जाता है। वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी, श्री Kashi Vishwanath मन्दिर एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है। ये शहर सहस्रों वर्षों से भारत का, विशेषकर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है। Kashi या वाराणसी को प्रायः ‘मंदिरों का शहर’, ‘भारत की धार्मिक राजधानी’, ‘भगवान शिव की नगरी’, ‘दीपों का शहर’, ‘ज्ञान नगरी’ आदि विशेषणों से संबोधित किया जाता है। Kashi वाराणसी में मृत्यु होना एक धार्मिक मान्यता के अनुसार शुभ माना जाता है, और यह माना जाता है कि वहां मृत्यु होने से आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। काशी को मोक्ष की भूमि माना जाता है और कहा जाता है कि भगवान शिव स्वयं मरने वाले के कानों में तारक मंत्र देते हैं।
Kashi-मोक्ष की भूमि
काशी को धार्मिक ग्रंथों में मोक्ष की भूमि के रूप में वर्णित किया गया है, जहां मृत्यु होने से आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। काशी को भगवान शिव की नगरी भी माना जाता है, और शिव को मोक्षदाता कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे मोक्ष प्रदान करते हैं। मणिकर्णिका घाट काशी में स्थित एक प्रसिद्ध घाट है, जहां मरणोपरांत शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है। यह माना जाता है कि इस घाट पर अंतिम संस्कार करने से आत्मा को मोक्ष मिलने की संभावना बढ़ जाती है। काशी में मृत्यु को उत्सव के रूप में भी देखा जाता है, और यह कहा जाता है कि काशी में मृत्यु होने से व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है, इसलिए Kashi में प्राण त्यागने वालों की अंतिम यात्रा अक्सर गाजेबाजे के साथ निकाली जाती है। धार्मिक दृष्टिकोण से, काशी में मृत्यु होने से मोक्ष मिलता है, लेकिन यह भी माना जाता है कि मोक्ष प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अपने जीवन में अच्छे कर्म करने चाहिए।
Kashi में कुछ ऐसे भवन हैं, जिन्हें मुमुक्षु भवन कहा जाता है, जहां लोग अपनी मृत्यु का इंतजार करते हैं, क्योंकि उन्हें काशी में ही अपनी अंतिम सांस की इच्छा होती है। काशी में एक ऐसा होटल भी है, जिसे “मौत का होटल” कहा जाता है, जहां लोग अपनी जीवन यात्रा के अंतिम दिनों में आते हैं और वहीं रहकर अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा करते हैं।
Kashi में अंतिम संस्कार और मान्यताएं
काशी को मोक्ष की नगरी माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि यहां अंतिम संस्कार करने से व्यक्ति को बैकुंठ की प्राप्ति होती है। पितृदेव के अनुसार, अस्थि विसर्जन भी एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसमें मृत व्यक्ति की अस्थियों को गंगा नदी में विसर्जित किया जाता है। Kashi में मणिकर्णिका घाट के अलावा हरीशचंद्र घाट भी एक महत्वपूर्ण श्मशान घाट है। मणिकर्णिका घाट पर 24 घंटे चिताएं जलती रहती हैं, जो इसे दुनिया का एक अनोखा श्मशान घाट बनाता है। ऐसा कहा जाता है कि मणिकर्णिका घाट पर जलने वाली चिताओं की अग्नि आज तक कभी नहीं बुझी!
काशी में नहीं होता इनका दाह संस्कार
Kashi में प्राण त्यागने या अंतिम संस्कार होने की इच्छा तो सबकी होती है, लेकिन कुछ लोगों के शवों का दाहसंस्कार काशी में नहीं किया जाता। गर्भवती महिलाएं, साधु, बच्चे और सांप काटने से मरे लोगों के शवों का अंतिम संस्कार अलग तरीके से होता है।
गर्भवती महिलाओं का कभी भी काशी में दाह संस्कार नहीं किया जाता है। माना जाता है कि गर्भवती महिलाओं के शरीर को जलाने से पेट फूल जाता है और चिता में पेट फटने की स्थिति बन सकती है। Kashi में साधुओं के शवों को जलाया नहीं जाता है। उनके शवों को पानी में छोड़ दिया जाता है या दफना दिया जाता है। साधु-संतों का दाह संस्कार नहीं करके समाधि दी जाती है, क्योंकि उन्हें जीवित रहते हुए ही सांसारिक बंधनों से मुक्त माना जाता है। उनके लिए शरीर, आत्मा के वाहन के रूप में है और वे तपस्या और साधना के माध्यम से मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। इसलिए, उनके अंतिम संस्कार के बजाय, उन्हें भूमि में समाधि दी जाती है, जो उनके ज्ञान और तपस्या के प्रति सम्मान दर्शाती है।
काशी में छोटे बच्चों के शवों को भी जलाना मना है। काशी (वाराणसी) में, दो साल से कम उम्र के बच्चों का दाह संस्कार नहीं किया जाता है, बल्कि उन्हें दफनाया जाता है। हिंदू धर्म के अनुसार, शिशुओं को मोह-माया से मुक्त माना जाता है और उनकी आत्मा को शरीर से तुरंत लगाव नहीं होता है, इसलिए उन्हें दफनाया जाता है। एक बच्चा बारह साल से कम उम्र का है, तो उसे दहन नहीं करते। सर्पदंश से मरे लोगों के शवों का काशी में दाह संस्कार नहीं किया जाता है। कहा जाता है कि सांप काटने से मरे लोगों का दिमाग 21 दिनों तक जीवित रहता है. ऐसे में, उनके शव को केले के तने में बांधकर पानी में तैरने के लिए छोड़ दिया जाता है। त्वचा रोग या कुष्ठ रोग से पीड़ित रोगी की मृत्यु हो जाने पर भी, उसके शव का काशी में दाह संस्कार नहीं किया जाता है। कहा जाता है कि उनके शवों को जलाने से रोग के बैक्टीरिया हवा में फैल जाते हैं, और अन्य लोग भी इस रोग के शिकार हो सकते हैं। Chicken Pox या शीतला माता के प्रकोप से मरे लोगों के शवों का भी दाह संस्कार नहीं किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि उन शवों को मां देवी ने स्वयं ले लिया है, इसलिए उन्हें जलाया नहीं जाता है।
इन तीन महाश्मशानों में 24 घंटे होता है अंतिम संस्कार
Kaahi: मृत्यु किसी भी जीवन का अटल सत्य है। अलग-अलग धर्मों की अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के बाद शरीर की अंतिम क्रिया की जाती है। इसके बाद मृतक की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार संध्या काल के पश्चात मानव शरीर का अंतिम संस्कार करना वर्जित है। यहां तक कि पूर्वजों के श्राद्ध तर्पण का कार्य भी संध्या काल के पश्चात नहीं किया जाता है। लेकिन जिन तीन स्थानों को ‘महाश्मशान’ की संज्ञा दी जाती है, उनमें चौबीसों घंटे अंतिम संस्कार करने की अनुमति धर्मशास्त्रों में दी गई है। जिन तीन श्मशान घाटों को ‘महाश्मशान’ की संज्ञा दी गई है- Kashi वाराणसी का मणिकर्णिका घाट, उज्जैन के महाकाल मंदिर के पास बना हुआ श्मशान घाट और नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर के पास बना श्मशान घाट। भगवान शिव से जुड़े होने के कारण इन घाटों को महाश्मशान कहा जाता है। यहां चौबीसों घंटे अंतिम संस्कार किए जाने की अनुमति है।
मणिकर्णिका घाट का महत्व क्यों
Kashi: पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं अपने निवास के लिए काशी की रचना की थी। यह भी कहा जाता है कि काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी हुई है। इस नगरी के निर्माण के पश्चात उन्होंने भगवान विष्णु को यहां धार्मिक कार्य करने के लिए भेजा था। यहां आकर भगवान विष्णु ने मणिकर्णिका घाट पर हजारों सालों तक तपस्या की थी। इसी कारण इस घाट का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। कहा जाता है कि मणिकर्णिका घाट पर हजारों सालों से चिताएं जल रही हैं और यह कभी भी पूरी तरह शांत नहीं होती। स्वयं भगवान शिव यहां औघड़ के रूप में विराजते हैं। यहां दाह संस्कार हुए व्यक्ति का कभी पुनर्जन्म नहीं होता है और वह जन्म-मृत्यु के बंधन से सदैव के लिए मुक्त हो जाता है। होली के समय यहां चिता की राख से होली खेलने की परंपरा सैकड़ों सालों से चली आ रही है।
निगमबोध घाट पर भी चौबीसों घंटे अंतिम संस्कार
राजधानी दिल्ली के निगमबोध घाट के पंडित संजय शर्मा बताते हैं कि धर्मशास्त्रों के मुताबिक सायंकाल के बाद अंतिम संस्कार करने की अनुमति नहीं है। लेकिन बदलते समय में लोगों के पास इतनी सुविधा नहीं है कि अगर रात्रि काल में किसी का देहावसान हो जाता है, तो मृतक शरीर को लंबे समय तक रखा जा सके। यही कारण है कि अब लोग देर रात भी अंतिम संस्कार कर देते हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली में निगमबोध घाट एकमात्र ऐसा श्मशान घाट है जो चौबीसों घंटे चालू रहता है। इसके अलावा बाकी सभी श्मशान घाटों को शाम आठ बजे के बाद बंद कर दिया जाता है। लेकिन यहां भी ज्यादातर अंतिम संस्कार दिन के समय ही हो जाते हैं। रात्रि के समय अधिकतम 10 बजे तक दाह-संस्कार होता है। इसके बाद कभी-कभार इक्के-दुक्के दाह-संस्कार ही होते हैं।
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