डॉक्टरों और अस्पतालों के विज्ञापन पर NMC की नई गाइडलाइन, भ्रामक प्रचार पर सख्ती

The CSR Journal Magazine

डॉक्टरों के डिजिटल प्रचार के नियम सख्त, डॉक्टर स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चला सकेंगे, लेकिन व्यावसायिक प्रचार पर पाबंदी

देश में चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सा पेशे के नियमन से जुड़ी राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने डॉक्टरों, अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों के विज्ञापन तथा सार्वजनिक संवाद को लेकर नई दिशा-निर्देश जारी किए हैं। 6 अक्टूबर 2026 को जारी इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य चिकित्सा सेवाओं के प्रचार में पारदर्शिता लाना, मरीजों को भ्रामक दावों से बचाना और चिकित्सा पेशे के व्यावसायीकरण पर अंकुश लगाना है। नई व्यवस्था में डॉक्टरों को स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने, सोशल मीडिया के माध्यम से जनस्वास्थ्य से जुड़ी प्रमाणिक जानकारी साझा करने और शैक्षणिक चर्चाओं में भाग लेने की अनुमति है। हालांकि, इस छूट का इस्तेमाल मरीजों को आकर्षित करने, अपनी सेवाओं का अनुचित प्रचार करने या इलाज की सफलता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए नहीं किया जा सकेगा। नए नियमों के तहत इंटरनेट, सामाजिक माध्यमों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार प्रचार सामग्री को भी नियामकीय दायरे में लाया गया है।

सोशल मीडिया पर डॉक्टरों के प्रचार को लेकर क्या बदलेगा?

डिजिटल माध्यमों के विस्तार के साथ डॉक्टरों और अस्पतालों ने अपनी सेवाओं की जानकारी देने के लिए इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक और अन्य ऑनलाइन मंचों का इस्तेमाल बढ़ाया है। कई बार इन माध्यमों पर इलाज के परिणाम, मरीजों की प्रशंसात्मक टिप्पणियां, विशेष उपलब्धियां और सफलता के दावे इस तरह प्रस्तुत किए जाते हैं कि मरीज किसी खास डॉक्टर या अस्पताल को दूसरों से बेहतर समझने लगते हैं। एनएमसी की नई गाइडलाइन इसी तरह के प्रचार पर नियंत्रण लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आयोग का उद्देश्य डॉक्टरों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी साझा करने से रोकना नहीं, बल्कि चिकित्सा शिक्षा और जनजागरूकता के नाम पर होने वाले व्यावसायिक प्रचार के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करना है।
डॉक्टर अपने विशेषज्ञता क्षेत्र, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, बीमारियों से बचाव, जांच की जरूरत, उपचार के विकल्पों और वैज्ञानिक शोध के बारे में जानकारी साझा कर सकते हैं। लेकिन सामग्री का उद्देश्य यदि लोगों को प्रभावित करके अपने पास इलाज के लिए बुलाना, मरीजों को आकर्षित करना या अपनी पेशेवर प्रतिष्ठा को कृत्रिम रूप से बढ़ाना है, तो वह नियमों के दायरे में आ सकती है।

मरीजों के प्रशंसापत्र और सेलिब्रिटी प्रचार पर रोक

नई गाइडलाइन का एक प्रमुख पहलू मरीजों की प्रशंसात्मक टिप्पणियों और अन्य लोगों के समर्थन के माध्यम से चिकित्सा सेवाओं का प्रचार करने पर रोक है। डॉक्टरों और अस्पतालों को मरीजों, चर्चित हस्तियों, सोशल मीडिया प्रभावशाली व्यक्तियों, कर्मचारियों या अन्य तीसरे पक्षों के प्रशंसापत्र और समर्थन का इस्तेमाल करके अपनी सेवाओं का प्रचार नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए, किसी मरीज के इलाज के बाद उसके अनुभव को इस तरह प्रस्तुत करना कि दूसरे लोग भी उसी डॉक्टर या अस्पताल से इलाज कराने के लिए प्रेरित हों, नियमों के उल्लंघन का विषय बन सकता है। इसी तरह किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की लोकप्रियता का सहारा लेकर किसी अस्पताल या डॉक्टर की सेवाओं को बढ़ावा देना भी प्रतिबंधित प्रचार की श्रेणी में आ सकता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज चिकित्सा संबंधी निर्णय किसी भावनात्मक अपील, प्रसिद्ध व्यक्ति की सिफारिश या चुनिंदा सफलता की कहानी के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी बीमारी, चिकित्सकीय जरूरत और विश्वसनीय जानकारी के आधार पर लें।

‘सबसे बेहतर डॉक्टर’ और शत-प्रतिशत सफलता जैसे दावों पर सख्ती

चिकित्सा सेवाओं के प्रचार में कई बार ‘नंबर एक डॉक्टर’, ‘सबसे अच्छा विशेषज्ञ’, ‘शत-प्रतिशत सफलता’, ‘गारंटी के साथ इलाज’ और ‘चमत्कारी उपचार’ जैसे दावे किए जाते हैं। नई गाइडलाइन ऐसे दावों पर सख्ती करती है, खासकर तब जब उनके समर्थन में वस्तुनिष्ठ और सत्यापन योग्य प्रमाण उपलब्ध न हों। चिकित्सा विज्ञान में उपचार का परिणाम मरीज की उम्र, बीमारी की गंभीरता, अन्य स्वास्थ्य समस्याओं, उपचार के तरीके और कई दूसरे कारकों पर निर्भर करता है। इसलिए किसी भी डॉक्टर या अस्पताल के लिए हर मरीज के पूरी तरह ठीक होने की गारंटी देना भ्रामक हो सकता है। इसी तरह मरीजों की संख्या, ऑपरेशन की सफलता, उपचार के परिणाम या व्यक्तिगत उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना भी अनुचित प्रचार के दायरे में आ सकता है। नई व्यवस्था का उद्देश्य चिकित्सा संबंधी दावों को प्रमाणिक, संतुलित और जिम्मेदार बनाना है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार विज्ञापनों पर भी नजर

नई गाइडलाइन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से तैयार या उसकी सहायता से बनाई गई प्रचार सामग्री को भी शामिल किया गया है। इसका महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि अब डिजिटल मंचों पर कृत्रिम वीडियो, आभासी पात्र, तैयार की गई तस्वीरों और स्वचालित लेखन के जरिये किसी सेवा का प्रचार करना आसान हो गया है। नियमों के अनुसार, डॉक्टर और अस्पताल एआई का इस्तेमाल करके नकली मरीजों के प्रशंसापत्र, गढ़े हुए चिकित्सकीय परिणाम या भ्रामक प्रचार सामग्री तैयार नहीं कर सकते। चिकित्सा सेवाओं का प्रचार करने के उद्देश्य से कृत्रिम तरीके से विश्वसनीयता का झूठा आभास पैदा करना भी प्रतिबंधित गतिविधियों में शामिल है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि स्वास्थ्य संबंधी हर शैक्षणिक सामग्री बनाने में एआई का इस्तेमाल अपने आप प्रतिबंधित हो गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि सामग्री का उद्देश्य क्या है, उसमें दी गई जानकारी कितनी प्रमाणिक है और क्या उसका उपयोग भ्रामक या अनुचित व्यावसायिक प्रचार के लिए किया जा रहा है।

फर्जी लाइक, समीक्षा और खोज परिणामों में हेरफेर पर रोक

डिजिटल माध्यमों पर किसी डॉक्टर या अस्पताल की लोकप्रियता का आकलन कई लोग अनुयायियों की संख्या, टिप्पणियों, समीक्षाओं और खोज परिणामों के आधार पर करते हैं। ऐसे में इन आंकड़ों को कृत्रिम रूप से बढ़ाना मरीजों को गलत धारणा दे सकता है। एनएमसी की नई गाइडलाइन के तहत फर्जी अनुयायी, लाइक, वीडियो देखे जाने की संख्या, टिप्पणियां, समीक्षाएं या रेटिंग जुटाकर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने पर रोक लगाई गई है। इसी तरह खोज इंजन या मोबाइल अनुप्रयोगों में अपनी स्थिति को अनुचित रूप से ऊपर दिखाने के लिए भुगतान करके रैंकिंग में हेरफेर करना भी प्रतिबंधित है। इस कदम का उद्देश्य वास्तविक पेशेवर योग्यता और डिजिटल लोकप्रियता के बीच अंतर बनाए रखना है। किसी डॉक्टर की लोकप्रियता अपने आप में उसके उपचार की गुणवत्ता का प्रमाण नहीं मानी जा सकती।

डॉक्टरों को अपनी पहचान और योग्यता की जानकारी देनी होगी

डिजिटल माध्यमों पर चिकित्सा संबंधी जानकारी साझा करते समय पारदर्शिता भी नई व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर सामग्री प्रकाशित करने वाले पंजीकृत डॉक्टरों को अपना नाम, शैक्षणिक योग्यताएं, पंजीकरण की स्थिति और संबंधित राज्य चिकित्सा रजिस्टर अथवा राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर का पंजीकरण क्रमांक बताना होगा। अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों को भी अपने प्रचारात्मक या सूचनात्मक संदेशों में संबंधित डॉक्टरों की आवश्यक पहचान संबंधी जानकारी स्पष्ट रखनी होगी। इससे मरीजों को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि जानकारी साझा करने वाला व्यक्ति कौन है, उसकी चिकित्सा संबंधी योग्यता क्या है और वह संबंधित नियामकीय व्यवस्था के तहत पंजीकृत है या नहीं।

स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों पर रोक नहीं

नई गाइडलाइन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि डॉक्टरों के लिए जनस्वास्थ्य से जुड़ी गतिविधियों का रास्ता खुला रखा गया है। डॉक्टर स्वास्थ्य जागरूकता शिविर आयोजित कर सकते हैं, बीमारियों से बचाव के उपाय बता सकते हैं, टीकाकरण के महत्व पर जानकारी दे सकते हैं और मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर तथा संक्रामक रोगों से संबंधित शैक्षणिक सामग्री साझा कर सकते हैं। इसी तरह चिकित्सा सम्मेलनों, शैक्षणिक चर्चाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों में भाग लेना भी स्वीकार्य है। लेकिन इन गतिविधियों में दी गई जानकारी तथ्यपरक होनी चाहिए और इन्हें किसी डॉक्टर या अस्पताल की सेवाओं के अप्रत्यक्ष विज्ञापन में नहीं बदला जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, हृदय रोग से बचाव के उपाय बताने वाला वीडियो जनजागरूकता का हिस्सा हो सकता है। इसके विपरीत, उसी वीडियो का उपयोग किसी विशेष अस्पताल को सर्वोत्तम बताने, बिना प्रमाण उपचार की गारंटी देने या मरीजों को व्यावसायिक रूप से आकर्षित करने के लिए किया जाता है, तो उसकी प्रकृति बदल सकती है।

नियम तोड़ने पर क्या कार्रवाई हो सकती है?

एनएमसी ने इन दिशा-निर्देशों के पालन की जिम्मेदारी संबंधित डॉक्टरों, अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों पर रखी है। किसी पंजीकृत डॉक्टर की ओर से प्रतिबंधित प्रचार को अधिकृत करने, उसमें भाग लेने, उसका समर्थन करने या उसके लिए जिम्मेदार होने की स्थिति में संबंधित चिकित्सा परिषद या सक्षम नियामकीय निकाय उसके पेशेवर आचरण की जांच कर सकता है। डॉक्टरों के मामलों में राज्य चिकित्सा परिषद, एनएमसी का नैतिकता एवं चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड या अन्य सक्षम प्राधिकरण लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं। अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों के मामलों में संबंधित कानूनों और राज्य के नियमों के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है। दिशा-निर्देशों में अपील की व्यवस्था भी शामिल है। इसलिए किसी उल्लंघन के आरोप को अपने आप दोष सिद्ध होना नहीं माना जाना चाहिए; कार्रवाई संबंधित प्रक्रिया के अनुसार होगी।

मरीजों के हितों की सुरक्षा क्यों जरूरी?

स्वास्थ्य सेवाओं में मरीज अक्सर बीमारी, दर्द, भय और अनिश्चितता के बीच उपचार का फैसला लेते हैं। ऐसे समय में भ्रामक विज्ञापन, झूठे सफलता-दावे या प्रभावशाली लोगों की सिफारिश उनके निर्णय को प्रभावित कर सकती है। इससे मरीज अनावश्यक खर्च कर सकते हैं या अपनी बीमारी के लिए उपयुक्त उपचार चुनने में भ्रमित हो सकते हैं। नई गाइडलाइन चिकित्सा पेशे में भरोसा बनाए रखने की इसी जरूरत से जुड़ी है। इसका उद्देश्य डॉक्टरों की विशेषज्ञता को प्रचार के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता, प्रमाणिक जानकारी और पेशेवर आचरण के आधार पर सामने लाना है। अस्पतालों और डॉक्टरों के लिए भी यह आवश्यक होगा कि वे अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया खाते, प्रचार सामग्री और डिजिटल संचार की समीक्षा करें। मरीजों की तस्वीरों, उपचार के परिणामों और निजी अनुभवों का उपयोग करते समय गोपनीयता, सहमति और लागू पेशेवर नियमों का ध्यान रखना जरूरी रहेगा।

चिकित्सा क्षेत्र में पारदर्शिता की दिशा में कदम

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की नई गाइडलाइन डिजिटल दौर में चिकित्सा सेवाओं के प्रचार को अधिक जिम्मेदार बनाने का प्रयास है। इसमें एक ओर डॉक्टरों को स्वास्थ्य शिक्षा, जनजागरूकता और वैज्ञानिक संवाद में भाग लेने की अनुमति दी गई है, वहीं दूसरी ओर झूठे दावों, फर्जी समीक्षाओं, मरीजों के प्रशंसापत्रों के प्रचारात्मक इस्तेमाल और एआई से तैयार भ्रामक सामग्री पर रोक लगाई गई है। इन नियमों का वास्तविक प्रभाव उनके पालन, शिकायतों की निष्पक्ष जांच और नियामकीय संस्थाओं की प्रभावी कार्रवाई पर निर्भर करेगा। यदि इनका सही ढंग से क्रियान्वयन होता है, तो मरीजों को चिकित्सा सेवाओं के बारे में अधिक विश्वसनीय जानकारी मिल सकती है और डॉक्टरों तथा अस्पतालों के बीच प्रतिस्पर्धा को अधिक नैतिक बनाने में मदद मिल सकती है। निष्कर्षतः, नई व्यवस्था डॉक्टरों को बोलने या सोशल मीडिया पर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी साझा करने से रोकने के बजाय यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि चिकित्सा संवाद का केंद्र मरीज का हित, वैज्ञानिक प्रमाण और पेशेवर ईमानदारी रहे—न कि भ्रामक विज्ञापन और व्यावसायिक लाभ।

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