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राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस – प्रगतिशील भारत में सेफ्टी जरुरी

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राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस - प्रगतिशील भारत में सेफ्टी जरुरी
 
ज़रा सोचिये कि आप गहरी नींद में हो और अचानक आधी रात को आपको सांस लेने में दिक्कत होनी लगे तो फिर क्या होगा, कुछ इसी तरह हुआ था विशाखापट्टनम के लोगों को। वो भयंकर मंजर आज भी लोग सोचकर सहम जाते है। एक ज़हरीली गैस ने मौत का तांडव खेला और कई लोगों की जिंदगी को लील लिया। मई 2020 को आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में तड़के एक केमिकल फ़ैक्टरी में गैस रिसाव होने से बड़ा हादसा हो गया। हादसे में 11 लोगों की मौत हुई, 20 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए। हादसे में करीब 150 बच्चों सहित 300 से ज्यादा लोगों का इलाज चला।
इतना ही नहीं हाल ही में 25 फरवरी को तमिलनाडु के विरुधुनगर में एक पटाखा फ़ैक्टरी में आग लगने से बड़ा हादसा हो गया है, जिसमें छह लोगों की मौत हो गयी। इसी तरह से हम अक्सर फ़ैक्टरी में बॉयलर फटने की दुर्घटनाओं के बारें से खबर सुनते रहते है। भोपाल गैस त्रासदी को भला पीड़ित कैसे भुला सकता है। ये तमाम दुर्घटनाएं इसलिए हुई क्योंकि कहीं न कहीं सुरक्षा में चूक हुई। ये दुर्घटनाएं रोकी जा सकती थी, महज जरुरत थी जागरूकता की। जरुरत थी रखरखाव की। जरुरत थी सतर्कता की। और सबसे महत्त्वपूर्ण सुरक्षा की।

क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस (National Safety Day)

लोगों के बीच में सुरक्षा जागरुकता को बढ़ाने के लिये 4 मार्च को हर साल भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस /सप्ताह (National Safety Day)  अभियान मनाया जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य आम लोगों में सुरक्षा के प्रति जागरूकता लाना और दुर्घटनाओं को रोकना है। इस सप्ताह के दौरान अलग-अलग जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से औद्योगिक दुर्घटनाओं से बचाव के तरीकों से लोगों को अवगत कराया जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सप्ताह में होने वाली प्रत्येक गतिविधि का एकमात्र ध्येय लोगों को उनकी सुरक्षा के लिए जागरूक करना है। साथ ही उन्हें सुरक्षा के विभिन्न तरीकों से अवगत कराना होता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस का इतिहास

4 मार्च, 1966 को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की स्थापना हुई थी और इस मौके पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने औद्योगिक सुरक्षा के लिए व्यापक चेतना जगाने का उद्घोष किया था। राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने औद्योगिक सुरक्षा को एक नई दिशा दी जिसमें ये साफ़ तौर पर बताया गया कि सुरक्षा मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी तो है, लेकिन उसमें सबका सहभाग चाहिये। 1966 के पहले सुरक्षा को लेकर स्थिति वैसी नहीं थी। न केवल अपने देश में बल्कि वेस्टर्न कंट्रीज में भी सुरक्षा के प्रति व्यक्ति की सोच बहुत ज्यादा विकसित नहीं थी। लेकिन शिक्षा के प्रचार प्रसार से अनेक जन आंदोलन हुए। लोगों ने अपने अधिकार और कर्तव्यों के बारे में सोचा और धीरे धीरे सुरक्षा को अहमियत दी जाने लगी। दुर्घटना मात्र एक संयोग नहीं हो सकता, लापरवाही और सुरक्षा में कोताही की वजह से दुर्घटनाएं होती है। बदलते वक़्त के साथ सुरक्षा को लेकर सरकार ने कानून बनाए। भारत में 1948 में कारखाना अधिनियम बना।

बनते भारत में सुरक्षा अहम

भारत एक डेवलपिंग कंट्री है, यहां निरंतर विकास के काम हो रहे है, डेवलपिंग इकॉनमी होने के नाते बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर के काम हो या फिर इंडस्ट्रियल हर जगह विकासशील भारत की नींव रखी जा रही है लिहाजा बनते भारत में सुरक्षा अहम होता जा रहा है। और सुरक्षा तभी संभव है जब इन कंपनियों की मैनेजमेंट सुरक्षा को अपनी वैधानिक व नैतिक ज़िम्मेदारी मानेंगी। हर स्तर के कर्मचारी के लिए आवश्यकतानुसार सुरक्षा-प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाएगी। प्रशिक्षण के माध्यम से काम की जानकारी देना, सुरक्षा के प्रति जागरुकता पैदा करना महत्त्वपूर्ण है।
सेफ्टी मैनेजमेंट सिस्टम के कुछ बातों पर बल दिया जाना जरुरी है। पहली बात है सुरक्षा एवं स्वास्थ्य नीति, जिसे निश्चित करना आवश्यक है। यह संस्थान की मान्यता और मूल्यों की अवधारणा का संकेत है। इस नीति से ही स्पष्ट होनी चाहिए कि मैनेजमेंट अपने कर्मचारियों के प्रति कितनी संजीदा है। इसका प्रभाव हर एक कर्मचारी पर पड़ता है। इसके साथ ही हर साल सुरक्षा कार्य योजना होनी चाहिए जिसके अंतर्गत आर्थिक प्रावधान के साथ ही ख़तरों के आकलन व निवारण की योजना, आकस्मिक स्थिति से निपटने का पूरा प्रावधान होना जरुरी है। सुरक्षा न केवल मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी है, बल्कि यह प्रत्येक कर्मचारी की भी ज़िम्मेदारी है।
जैसे-जैसे डेवलपमेंट और इंडस्ट्रीज़ का दायरा बढ़ रहा है, वैसे-वैसे उनकी सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी बढ़ रही हैं। आज औद्योगिक सुरक्षा को लेकर कानून सख्त हुए हैं, लेकिन उससे भी जरूरी है वास्तविक सुरक्षा। औद्योगिक सुरक्षा प्रबंधन का मकसद है जोखिम, दुर्घटना और उससे लगने वाली चोटों व नुकसान को कम करना और इसके लिए सुरक्षा प्रबंधन के तमाम सिद्धांतों व तकनीकों पर अमल किया जाना। कर्मचारी की सेहत से लेकर सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी व मजबूती तक के मकसद को हासिल करने में मदद करते हैं इंडस्ट्रियल सेफ्टी।

सुरक्षा नियमों और सेफ्टी मानकों का पालन कर हादसों को टाला जा सकता है

यदि औद्योगिक सुरक्षा के नियमों, सिद्धांतों और मानकों का सही-सही पालन किया जाए तो कोई वजह नहीं कि हादसा हो जाए। हमारे देश में आजादी के बाद से काफी ज्यादा इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट हुआ है, आजादी के समय भारत एक कृषि प्रधान देश था जो अब एक टेक्नो-प्रोफेशनल, इंडस्ट्रियल इकॉनमी में बड़ी तेज़ी से परिवर्तित हो रहा है। लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि, इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट के साथ ही इंडस्ट्रियल हज़र्ड्स यानी कि जोखिम भी लगातार बढ़ रहे हैं। आजकल लाखों लोग भारत की अनेक छोटी-बड़ी फ़ैक्टरियों और कंपनियों और मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्रीज़ में काम करते हैं। ऐसे में इन लाखों-करोड़ों लोगों के जान-माल के खतरे को खत्म करने के लिए ही आजकल हमारे देश सहित दुनिया-भर में इंडस्ट्रियल सेफ्टी के कॉन्सेप्ट को प्रैक्टिकल एप्रोच के साथ पूरी तरह अपनाया जा रहा है।

Covid काल में सुरक्षा (सेफ्टी) के प्रति जागरूकता और सावधानियां बेहद जरुरी

दरअसल, इंडस्ट्रियल सेफ्टी के प्रति जागरूकता और सावधानियां बेहद जरुरी है। ख़ास कर कोविड काल में, लॉक डाउन के बाद फिर से जब कंपनियां खुल रही हैं। किसी भी इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाली मशीनरी, इक्विपमेंट्स या केमिकल्स आदि से होने वाले एक्सीडेंट्स या हेल्थ रिस्क्स से उस इंडस्ट्री के सभी एम्पलॉईज़ को सुरक्षा देने की जानकारी और तरीकों के बारे में बताना चाहिए। पेशेवर लोग कारखाने या कंपनी के भीतर सेफ वर्क एनवायरनमेंट कैसे बने इसके लिए उपयोगी कदम उठाना चाहिए। यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी कंपनी या इंडस्ट्री में सभी सेफ्टी मेजर्स और सेफ्टी रेगुलेशन्स को फॉलो किया जा रहा है या नहीं। अपने एम्पलॉईज़ को सेफ्टी प्रैक्टिसेज से संबंधित ट्रेनिंग और जानकारी देने के साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जोखिम भरा काम करते समय वर्कर्स वेल-इक्विप्ड हों यानी वर्कर्स ने फेस मास्क, गॉगल्स और प्रोटेक्टिव ड्रेस पहनी है या नहीं।