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February 24, 2026

Metro Cities Divorce Cases Tripled Women Leading: मेट्रो शहरों में तलाकों की संख्या तीन साल में तीन गुना बढ़ी, 58 फीसदी महिलाएं कर रही है पहल

The CSR Journal Magazine
Metro Cities Divorce Cases Tripled Women Leading: दिल्ली की एक फैमिली कोर्ट में सुबह के समय एक महिला बैठी है। उम्र करीब 28-29 साल है, हाथ में तलाक की फाइल और चेहरे पर न तो आंसू हैं और न ही कोई घबराहट। यह एक चुनौतीपूर्ण फैसला है जो उसने अकेले लिया है। महज तीन साल पहले उसने शादी की थी, लेकिन आज वह यहां अपने भविष्य को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला लेने आई है। यह कहानी अकेली नहीं है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ें दिखाते हैं कि पिछले दो दशकों में तलाक की दर में बढ़ोतरी हुई है। जहां पहले भारत में केवल 0.6% विवाहित महिलाएं तलाकशुदा थीं, अब यह आंकड़ा बढ़कर करीब 1% हो गया है।

महिलाओं की बढ़ती आर्थ‍िक स्वतंत्रता

पुणे स्टडी 1986-87 के अनुसार, तलाक के 849 मामलों में 67% पतियों ने तलाक की याचिका दी थी, जबकि आज यह आंकड़ा बदल चुका है। करीब 58% महिलाएं अब स्वयं तलाक के लिए आगे आ रही हैं। 36 साल के पुरुष और 31 साल की महिलाएं तलाक की औसत आयु बन गई हैं। हालांकि, सरकारी स्तर पर तलाकशुदा महिलाओं और पुरुषों का एकीकृत डेटा नहीं है, लेकिन निजी मार्केट रिसर्च कंपनियों की स्टडी यह स्पष्ट करती हैं कि महिलाओं में तलाक की औसत आयु 31 है, जबकि पुरुषों में यह 36 है।

Metro Cities Divorce Cases Tripled Women Leading: स्वतंत्रता का प्रभाव

शहरी भारत में बुर्जुआ परिवेश और घरे में बढ़ती घरेलू हिंसा, बेवफाई या पारिवारिक दबाव के चलते तलाक की दर में वृद्धि हो रही है। पढ़ी-लिखी महिलाएं अपने अधिकारों को समझने लगी हैं और तलाक लेने में संकोच नहीं कर रही हैं। इस बदलाव में उनकी आर्थिक स्वतंत्रता भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

तलाक का सबसे कमजोर समय

एक स्टडी के अनुसार, शादी के तीन साल में सबसे अधिक रिश्ते टूटने की संभावना होती है। मुंबई के एक फैमिली कोर्ट के अध्ययन में बताया गया है कि 40% मामलों में विवाह शादी के तीन साल के भीतर ही टूट जाता है। सामान्यत: तलाक मांगने वाली महिलाएं 25 से 34 साल की आयु वर्ग में होती हैं।

तलाक की याचिकाओं का समय

आंकड़ों के अनुसार, जनवरी, सितंबर और मई में तलाक की याचिकाओं की संख्या अधिक होती है, जबकि अक्टूबर-नवंबर, दिसंबर और मार्च में यह संख्या कम होती है। इसके पीछे त्योहारों, बच्चों की छुट्टियों और अदालत के ग्रीष्मकालीन अवकाश जैसे कारण हैं। इसके चलते अदालतें अनिवार्य 6 महीने की प्रतीक्षा अवधि को माफ कर रही हैं, जिससे प्रक्रिया विवादित मामलों की तुलना में 30% कम तनावपूर्ण और तेज हो गई है।

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