महाराष्ट्र SIR में कई जगह 40 फीसदी मतदाताओं के नाम कटे, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब

The CSR Journal Magazine

मुंबई-पुणे में लाखों वोटर्स लिस्ट से बाहर; सुप्रीम कोर्ट पहुंचा महाराष्ट्र SIR मामला, 5 नवंबर को अगली सुनवाई

महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय निर्वाचन आयोग (ECI), केंद्र सरकार, महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर इस पूरे मामले पर जवाब तलब किया है। अदालत ने इस संवेदनशील मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 5 नवंबर 2026 तय की है। याचिकाकर्ता अरुण आनंदगिरी (जो पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट और पत्रकार हैं) द्वारा दायर इस याचिका में दावा किया गया है कि महाराष्ट्र में एसआईआर (SIR) अभियान के नाम पर करीब 33 फीसदी (लगभग 2 से 3 करोड़) मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गायब कर दिए गए हैं। वहीं, वरिष्ठ वकील अरविंद दातार ने कोर्ट के समक्ष यह चौंकाने वाला आंकड़ा रखा कि पुणे और मुंबई जैसे महानगरीय क्षेत्रों में कुछ जगहों पर तो 40.6 प्रतिशत तक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।

महाराष्ट्र SIR मतदाता सूची विवाद और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच मतदाता सूची को लेकर एक अभूतपूर्व कानूनी और प्रशासनिक संकट खड़ा हो गया है। राज्य में चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) अभियान के तहत लाखों नागरिकों के नाम मतदाता सूची से काटे जाने का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए निर्वाचन आयोग और केंद्र-राज्य सरकारों से त्वरित जवाब मांगा है।

पुणे और मुंबई में 40% से अधिक मतदाता सूची से बाहर: याचिका का दावा

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने पीठ को बताया कि महाराष्ट्र में कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगभग 9.79 करोड़ है। आयोग द्वारा जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि SIR प्रक्रिया के नाम पर राज्य भर में 2 करोड़ से अधिक मतदाताओं (लगभग 21.14 से 33 फीसदी) को सूची से बाहर कर दिया गया है क्योंकि वे अपने दिए गए पते पर नहीं मिले। सबसे गंभीर स्थिति मुंबई और पुणे जैसे शहरी केंद्रों की है। याचिका के अनुसार, इन दोनों बड़े शहरों में वर्तमान में लगभग 3,500 से अधिक पुनर्विकास परियोजनाएं (Redevelopment Projects) चल रही हैं। पुरानी आवासीय सोसायटियों और इमारतों के तोड़े जाने के कारण हजारों परिवार अस्थायी रूप से दूसरे इलाकों या उपनगरों में स्थानांतरित हो गए हैं। जब चुनाव आयोग के अधिकारियों ने सत्यापन (Verification) किया, तो इन नागरिकों को “व्यक्ति नहीं मिला” (Person Not Found) की श्रेणी में डालकर उनके नाम सूची से सीधे काट दिए गए। इसके अतिरिक्त, लगभग 1.22 करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड को ‘तार्किक विसंगतियों’ (Logical Discrepancies) के तहत सूची से हटाया गया है।

फॉर्म-6 भरने की अनिवार्यता पर विवाद और कोर्ट का आश्वासन

याचिका में चुनाव आयोग के उस निर्देश पर भी तीखे सवाल उठाए गए हैं, जिसके तहत नाम कट चुके मतदाताओं को दोबारा नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भरने को कहा जा रहा है। वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि फॉर्म-6 कानूनी रूप से केवल नए मतदाताओं (New Voters) के पंजीकरण के लिए होता है। जिन नागरिकों के नाम पहले से ही वैध रूप से मतदाता सूची में शामिल थे, उन्हें प्रशासनिक गलतियों के कारण दोबारा नए सिरे से पंजीकरण के लिए बाध्य करना उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बिंदु पर नागरिकों को बड़ी राहत देते हुए एक महत्वपूर्ण मौखिक आश्वासन दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र एसआईआर के दौरान जिन नागरिकों के नाम काटे गए हैं, यदि वे दोबारा अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने के लिए फॉर्म-6 भरते हैं, तो उनके खिलाफ ‘दोहरा पंजीकरण’ या किसी भी प्रकार की दंडात्मक कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी।

अंतिम सूची पर रोक और समयसीमा बढ़ाने से फिलहाल इनकार

याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस पूरे विवाद पर अपना अंतिम फैसला नहीं सुना देता, तब तक महाराष्ट्र में चल रही संशोधन प्रक्रिया को स्थगित रखा जाए और पुरानी Pre-SIR सूची के किसी भी मतदाता को बाहर न किया जाए। इसके साथ ही, दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की समयसीमा को आगे बढ़ाने की भी गुहार लगाई गई थी। हालांकि, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने चुनाव प्रक्रिया में देरी न हो, इसलिए फिलहाल दावों और आपत्तियों की समयसीमा को बढ़ाने से इनकार कर दिया। CJI ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि 5 नवंबर को सुनवाई के दौरान अदालत को लगता है कि वास्तव में बड़ी संख्या में लोग दस्तावेज जमा करने से चूक गए हैं और समय बढ़ाया जाना बेहद जरूरी है, तो अदालत उचित आदेश पारित कर सकती है। पूर्व में भी कई राज्यों में SIR से जुड़े मामलों में अदालत ने समयसीमा का विस्तार किया है।”

क्या है चुनाव आयोग का पक्ष और SIR का उद्देश्य?

दूसरी ओर, भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) का रुख स्पष्ट है कि मतदाता सूची को पूरी तरह पारदर्शी, त्रुटिहीन और अद्यतित बनाए रखना उसका संवैधानिक दायित्व है। आयोग के अनुसार, इस विशेष अभियान का उद्देश्य फर्जी मतदाताओं, दोहरी प्रविष्टियों (Duplicate Entries), मृत व्यक्तियों और स्थाई रूप से क्षेत्र छोड़ चुके लोगों के नामों को हटाना है ताकि चुनावी शुचिता बनी रहे।
आयोग ने महाराष्ट्र में एसआईआर का कार्यक्रम पहले ही संशोधित किया था, जिसके तहत दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तिथि 30 सितंबर से बढ़ाकर 12 अक्टूबर की गई थी। वर्तमान शेड्यूल के अनुसार, प्राप्त दावों और आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया 10 नवंबर तक पूरी की जानी है, जिसके बाद 16 नवंबर 2026 को अंतिम मतदाता सूची (Final Electoral Roll) का प्रकाशन होना तय है।

राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल

महाराष्ट्र में होने वाले आगामी चुनावों के ठीक पहले आए इस आंकड़े ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। नागरिक अधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस प्रक्रिया का सबसे ज्यादा असर गरीब, प्रवासी मजदूरों और झुग्गी-झोपड़ियों या पुनर्विकास वाले इलाकों में रहने वाले वंचित तबके पर पड़ रहा है。 विपक्ष का दावा है कि इतनी बड़ी संख्या में नाम कटना कोई तकनीकी चूक नहीं बल्कि एक बड़ी प्रशासनिक लापरवाही हो सकती है, जो निष्पक्ष मतदान को प्रभावित कर सकती है।
अब सभी की नजरें 5 नवंबर 2026 को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। चुनाव आयोग को अदालत के सामने यह साबित करना होगा कि करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया में स्थापित नियमों और उचित नोटिस देने की प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन किया गया था या नहीं। यदि कोर्ट आयोग के जवाब से संतुष्ट नहीं होता है, तो 16 नवंबर को आने वाली अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन पर रोक लग सकती है या नागरिकों को नाम जुड़वाने का एक और अतिरिक्त मौका मिल सकता है।

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