Kerala Secretariat 6 Lakhs Tea Bill: केरल में सरकारी खर्च को लेकर एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। राज्य सचिवालय में सिर्फ तीन महीनों के भीतर चाय पर 6 लाख रुपये से ज्यादा खर्च कर दिए गए। लोक प्रशासन विभाग (Public Administration Department) ने न सिर्फ इस खर्च को मंजूरी दी, बल्कि 2 फरवरी को इसका आधिकारिक आदेश भी जारी कर दिया। आर्थिक तंगी और खर्च कटौती की बातों के बीच सामने आए इस मामले ने आम लोगों को हैरान कर दिया है।
तीन महीने, सिर्फ चाय और 6 लाख रुपये!
जारी दस्तावेजों के मुताबिक, सचिवालय में मुख्य सचिव और विभिन्न विभागों के सचिवों की चाय पार्टी पर यह रकम खर्च हुई। अक्टूबर महीने में चाय पर 2,06,385 रुपये, नवंबर में 1,97,286 रुपये और दिसंबर में 2,01,763 रुपये का खर्च दिखाया गया है। यानी कुल मिलाकर तीन महीनों में 6,05,434 रुपये सिर्फ चाय पर उड़ गए। यही आंकड़े अब सोशल मीडिया और आम चर्चा का विषय बन गए हैं। सरकार की ओर से बताया गया है कि यह भुगतान सचिवालय परिसर में स्थित इंडियन कॉफी हाउस (Indian Coffee House) को किया गया है। चाय और अन्य जलपान की यह व्यवस्था उच्च अधिकारियों की बैठकों और रोजमर्रा के कामकाज के दौरान की गई। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतनी महंगी चाय कौन सी थी, जिसका बिल लाखों में पहुंच गया।
वित्तीय संकट के बीच फिजूलखर्ची पर सवाल
केरल पहले से ही वित्तीय संकट (Financial Crisis) से जूझ रहा है। सरकार खुद कई बार खर्चों में कटौती और सख्ती की बात कह चुकी है। ऐसे में चाय पर लाखों रुपये खर्च होने की खबर ने जनता के गुस्से को और भड़का दिया है। लोग पूछ रहे हैं कि जब आम आदमी से हर छोटी सुविधा के लिए पैसे वसूले जा रहे हैं, तब अफसरों की चाय पर इतना खर्च कैसे जायज ठहराया जा सकता है। सोशल मीडिया पर लोग तंज कस रहे हैं कि “क्या यह गोल्डन टी थी?” वहीं कुछ लोगों का कहना है कि अगर यही पैसा स्वास्थ्य, शिक्षा या जनकल्याण योजनाओं में लगाया जाता तो ज्यादा बेहतर होता।
Kerala Secretariat 6 Lakhs Tea Bill: सरकार की सफाई और बढ़ती बहस
हालांकि सरकार की तरफ से कहा गया है कि यह एक नियमित प्रशासनिक खर्च है और इसे नियमों के तहत स्वीकृति दी गई है। बावजूद इसके, पारदर्शिता (Transparency in Government Spending) और सरकारी खर्चों की प्राथमिकताओं को लेकर बहस तेज हो गई है। यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सरकारी तंत्र में खर्च को लेकर जवाबदेही पर्याप्त है, या फिर आम जनता की मेहनत की कमाई यूं ही चाय की चुस्कियों में उड़ती रहेगी।
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