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January 9, 2026

सर्द हवाओं में मां का प्यार, शहीद बेटे की प्रतिमा पर मां हर सर्दी लपेटती है कंबल, जानिए उसकी कहानी

The CSR Journal Magazine
जम्मू के अर्निया में ठंडी हवाओं के बीच एक अनोखी तस्वीर हर साल देखने को मिलती है। शहीद कांस्टेबल गुरनाम सिंह की प्रतिमा के पास उनकी मां, जसवंत कौर, एक भारी ऊनी कंबल लेकर आती हैं। जैसे ही ठंड की पहली लहर आती है, वह अपने बेटे की याद में प्रतिमा के कंधों पर दुलार भरी नजरों से कंबल लपेटती हैं। यह दृश्य सिर्फ गर्मी देने वाला नहीं, बल्कि मातृ प्रेम और बलिदान की मिसाल बन चुका है।

पत्थर की प्रतिमा में धड़कती ममता

साल 2021 में जब गुरनाम सिंह की प्रतिमा अर्निया में स्थापित हुई थी, तो वह पूरे देश के लिए वीरता और साहस का प्रतीक बनी। लेकिन जसवंत कौर के लिए यह केवल गौरव का प्रतीक नहीं, बल्कि उनका लाडला बेटा है, जो ठंड में कांप सकता है। उनका यह प्रतिवर्ष का कंबल भेंट करना, दर्शकों की आंखों में आंसू ला देता है, लेकिन मां के चेहरे पर संतोष झलकता है—जैसे उन्होंने अपने बेटे को हर ठंडी रात से बचा लिया हो।

पहला इश्क और अधूरी ख्वाहिशें

26 साल के गुरनाम सिंह की मां आज भी याद करती हैं कि जब उन्होंने बेटे को आखिरी बार देखा, तो उसके शादी के सपने बुने थे। उन्होंने सोचा था कि अगली छुट्टी पर घर में शहनाइयां बजेंगी। लेकिन गुरनाम का दिल देशभक्ति और सुरक्षा में बसा था। उसका ‘पहला इश्क’ उसकी वर्दी और मातृभूमि बनी, जिसने उसके निजी जीवन की इच्छाओं को पीछे छोड़ दिया।

देश के लिए शौर्य की अद्भुत कहानी

21 अक्टूबर 2016 को हीरानगर सेक्टर में घुसपैठियों को रोकते हुए गुरनाम सिंह ने एक आतंकवादी को ढेर किया और सीजफायर का मुंहतोड़ जवाब दिया। अगले दिन, गोलियों से छलनी होने के बावजूद वह पीछे नहीं हटे और अंततः भारत माता की गोद में शांति से सो गए। उनके इस साहस ने न सिर्फ देश को सुरक्षित किया, बल्कि उनके परिवार को भी गौरव और गर्व से भर दिया।

मां का त्याग और अनंत प्रेम

BSF की 173वीं बटालियन का यह वीर जवान आज भी अपनी मां के दिल में जीवित है। जसवंत कौर का यह त्याग यह याद दिलाता है कि शहादत सिर्फ सीमा पर नहीं होती। हर दिन, परिवार और मातृ प्रेम भी एक नई शहादत जीता है। कंबल केवल ऊन का टुकड़ा नहीं, बल्कि वह ममता है जो किसी भी दुश्मन या गोली से नष्ट नहीं हो सकती।

शहीदों की यादों में जीती ममता

गुरनाम सिंह की प्रतिमा के पास हर सर्दी में जसवंत कौर की यह परंपरा सिर्फ व्यक्तिगत श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि मातृ प्रेम, देशभक्ति और बलिदान की जीवंत मिसाल है। यह दिखाता है कि वीर जवानों का बलिदान सिर्फ उनके जीवन में नहीं, बल्कि उनके परिवार की रोज़मर्रा की जिंदगी में भी गहरा असर छोड़ता है।
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