भारत और ईरान के बीच जारी कूटनीतिक बातचीत का असर अब समुद्री व्यापार पर भी दिखाई देने लगा है। विदेश मंत्री S. Jaishankar ने बताया कि सीधे संवाद के चलते भारतीय झंडे वाले दो गैस टैंकर सुरक्षित रूप से Strait of Hormuz से गुजर पाए। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके लिए कोई स्थायी समझौता नहीं हुआ है और यह प्रक्रिया अभी जारी है।
भारत-ईरान बातचीत से खुला रास्ता
भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar ने एक इंटरव्यू में कहा कि नई दिल्ली और तेहरान के बीच सीधे संवाद के कारण भारतीय झंडे वाले दो गैस टैंकर शनिवार को सुरक्षित रूप से Strait of Hormuz से गुजर पाए।
उन्होंने बताया कि भारत इस समय ईरान के साथ लगातार बातचीत कर रहा है और इस संवाद के सकारात्मक नतीजे भी सामने आए हैं। जयशंकर के अनुसार, भारत का मानना है कि किसी भी तनावपूर्ण स्थिति में बातचीत और समन्वय ही सबसे बेहतर रास्ता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर इस तरह की कूटनीतिक कोशिशों से दूसरे देशों को भी बातचीत का रास्ता मिलता है तो यह वैश्विक स्तर पर सकारात्मक कदम होगा। फिलहाल भारत की प्राथमिकता अपने झंडे वाले जहाज़ों और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
कोई स्थायी समझौता नहीं, हर जहाज अलग मामला
जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत और ईरान के बीच जहाज़ों की आवाजाही को लेकर कोई स्थायी या औपचारिक समझौता नहीं हुआ है। भारतीय जहाज़ों के गुजरने का हर मामला अलग-अलग आधार पर देखा जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके बदले ईरान को भारत की ओर से कोई विशेष लाभ या सौदा नहीं दिया गया है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे कूटनीतिक और रणनीतिक संबंध ही इस संवाद की आधारशिला हैं। विदेश मंत्री के अनुसार, क्षेत्र में अभी कई भारतीय जहाज़ मौजूद हैं, इसलिए बातचीत की प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी ताकि ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार में बाधा न आए।
यूरोप भी तलाश रहा कूटनीतिक रास्ता
रिपोर्ट के अनुसार यूरोप के कई देश भी ऊर्जा आपूर्ति को सुचारु रखने के लिए तेहरान से बातचीत कर रहे हैं।
फ्रांस और इटली जैसे देशों ने संभावित कूटनीतिक समाधान पर चर्चा शुरू कर दी है। जयशंकर ने कहा कि हर देश का ईरान के साथ संबंध अलग होता है, इसलिए भारत के अनुभव की तुलना सीधे दूसरे देशों से नहीं की जा सकती। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि भारत अपने अनुभव यूरोपीय देशों के साथ साझा करने के लिए तैयार है। उन्होंने यह बयान ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने से पहले दिया था, जहां वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और मध्य-पूर्व की स्थिति पर चर्चा होने वाली है।
तनाव से बढ़ी तेल-गैस की कीमतें
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पर भी दिखाई देने लगा है। पिछले सप्ताह कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई, जो अगस्त 2022 के बाद पहली बार हुआ है।
दरअसल दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस आपूर्ति Strait of Hormuz के रास्ते से गुजरती है। यही वजह है कि इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा वैश्विक बाजार को प्रभावित कर सकती है।
भारत के लिए यह मार्ग और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत तरलीकृत प्राकृतिक गैस आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। भारत में करीब 33 करोड़ से अधिक घर खाना बनाने के लिए एलपीजी सिलेंडर पर निर्भर हैं। ऐसे में आपूर्ति में बाधा की आशंका से कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें भी देखी जा रही हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक जारी रहा तो तेल और गैस की कीमतों में और उछाल आ सकता है, जिसका असर सीधे भारत जैसे आयातक देशों की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।