Indian Navy के लिए 8 नेक्स्ट-जेन स्टील्थ वॉरशिप बनाने को मंजूरी

The CSR Journal Magazine
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने भारतीय नौसेना के लिए 8 अगली पीढ़ी के कार्वेट बनाने का एक बड़ा प्रोजेक्ट मंजूर किया है। इस प्रोजेक्ट की लागत लगभग 40 हजार करोड़ रुपये है। यह हाल के समय का पहला बड़ा रक्षा प्रोजेक्ट है जिसे शीर्ष स्तर पर मंजूरी मिली है। यह फैसला नौसेना के सतह बेड़े को मजबूत करने और देश में जहाज निर्माण क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

शिपयार्ड का चयन और रोजगार के अवसर, निर्माण कार्य की समयसीमा

यह प्रोजेक्ट देश के दो प्रमुख रक्षा शिपयार्ड, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) कोलकाता और गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (जीएसएल) को सौंपा गया है। दोनों शिपयार्ड मिलकर इन आठ एडवांस युद्धपोतों का निर्माण करेंगे। इससे दोनों कंपनियों को लंबे समय तक काम मिलेगा और छोटे-मझोले उद्योगों में हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे। निर्माण कार्य एक साल के अंदर शुरू होने की उम्मीद है। पहले कार्वेट की डिलीवरी चार से पांच साल में शुरू हो जाएगी। इससे नौसेना के बेड़े में नए जहाज जुड़ने की प्रक्रिया तेज होगी। पुराने जहाजों की जगह आधुनिक प्लेटफॉर्म आने से ऑपरेशनल क्षमता में सुधार होगा।

नेक्स्ट जनरेशन कॉरवेट की विशेषताएँ, आत्मनिर्भरता की दिशा में एक कदम

ये कार्वेट अपनी श्रेणी के सबसे एडवांस युद्धपोतों में गिने जाएंगे। इनमें स्टेल्थ यानी दुश्मन की नजरों से बचने की खास क्षमता होगी। ये जहाज बहुत तेज गति से मुड़ने और घूमने में सक्षम होंगे। इनमें आधुनिक हथियार और सेंसर लगाए जाएंगे। ये मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म होंगे, जो सतह पर दुश्मन के जहाजों से लड़ने, पानी के नीचे पनडुब्बियों का मुकाबला करने और हवा से आने वाले खतरों से निपटने में सक्षम होंगे। इन युद्धपोतों में 70 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल होगा। यह आत्मनिर्भर भारत अभियान के अनुरूप है। जब जहाज ज्यादातर देश में ही बनेंगे, तो तकनीक और कौशल भी देश में ही रहेगा। यह मंजूरी ऐसे समय में आई है जब भारतीय नौसेना भारतीय महासागर क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ा रही है।

चीनी गतिविधियों का मुकाबला

इस क्षेत्र में चीनी नौसेना की गतिविधियां बढ़ रही हैं। ऐसे में आधुनिक और बहुउद्देशीय युद्धपोतों की जरूरत और बढ़ गई है। नौसेना पहले से ही नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स, अगली पीढ़ी के डिस्ट्रॉयर्स और फ्लीट सपोर्ट शिप्स बनाने का कार्यक्रम चला रही है। अब इन आठ कार्वेट के जुड़ने से पूरा युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम और मजबूत होगा।

आर्थिक प्रभाव और भविष्य की संभावनाएँ, विदेशी मुद्रा की बचत

यह प्रोजेक्ट सिर्फ सैन्य ताकत बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इससे रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा। जीआरएसई और गोवा शिपयार्ड को लंबे समय तक ऑर्डर बुक मिलेगी। इससे उनकी वित्तीय स्थिति मजबूत होगी। आसपास के एमएसएमई को भी काम मिलेगा। कलपुर्जे, उपकरण और सेवाओं की सप्लाई चेन में हजारों लोगों को रोजगार के अवसर पैदा होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वदेशी सामग्री का ज्यादा इस्तेमाल होने से विदेशी मुद्रा की बचत होगी। साथ ही भविष्य में ऐसे जहाजों के निर्यात की संभावना भी बढ़ सकती है। जब देश खुद एडवांस युद्धपोत बना लेगा तो अन्य देशों को भी बेचने के रास्ते खुल सकते हैं।

सरकार की प्राथमिकताएँ, समुद्री सुरक्षा में वृद्धि

सीसीएस की इस मंजूरी से साफ है कि सरकार रक्षा क्षेत्र में बड़े प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता दे रही है। नौसेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आधुनिक प्लेटफॉर्म तैयार किए जा रहे हैं। स्टेल्थ तकनीक, मल्टी-रोल क्षमता और उच्च स्वदेशीकरण इन कार्वेट की खासियत होगी। निर्माण शुरू होने के बाद नियमित निगरानी और समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करना जरूरी होगा। अगर यह प्रोजेक्ट तय समय पर पूरा हुआ तो भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा क्षमता काफी बढ़ जाएगी। भारतीय महासागर क्षेत्र में भारत की उपस्थिति और मजबूत होगी तथा क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।

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