कम रडार क्रॉस सेक्शन (RCS) और झुंड में आने वाले ड्रोन के बढ़ते खतरे को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए ‘ड्रोन कैचर सिस्टम’ खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है. यह सिस्टम दुश्मन के ड्रोन को पहचानने, ट्रैक करने और जाल से खत्म करने में सक्षम होगा. कम रडार क्रॉस सेक्शन (Low-RCS) वाले ड्रोन और स्वॉर्म (झुंड में आने वाले ड्रोन) के बढ़ते खतरे को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए ड्रोन कैचर सिस्टम की खरीद प्रक्रिया शुरू कर दी है. इसके लिए मंत्रालय ने रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (RFI) जारी किया है. हालांकि, कितने सिस्टम खरीदे जाएंगे, इसका खुलासा नहीं किया गया है, लेकिन प्रस्तावित सिस्टम में तीन मुख्य हिस्से होंगे.
ड्रोन सेंसर
ड्रोन कैचर (नेट आधारित इंटरसेप्टर), ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन (GCS), यह सिस्टम लो-RCS ड्रोन और यूएएस (Unmanned Aerial Systems) को पहचानने, ट्रैक करने और जाल (नेट) के जरिए पकड़कर निष्क्रिय करने में सक्षम होगा.
क्यों पड़ी जरूरत?
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, हाल के सालों में छोटे और कम रडार सिग्नेचर वाले ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. ये ड्रोन अकेले भी आ सकते हैं और झुंड में भी हमला कर सकते हैं. सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ऐसे ड्रोन खतरों ने अलग तरह की चुनौती पेश की. इसके बाद एक समर्पित ड्रोन कैचर क्षमता की जरूरत महसूस हुई.
सिस्टम की मुख्य खूबियां
इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (ESA) या उससे बेहतर तकनीक पर आधारित होगा.
360 डिग्री कवरेज के साथ बड़े एयरस्पेस को स्कैन कर सकेगा.
एक साथ कम से कम 20 ड्रोन को डिटेक्ट और ट्रैक करने की क्षमता.
0.01 वर्गमीटर RCS वाले लक्ष्य को कम से कम 4 किलोमीटर दूरी से पहचान सकेगा.
दुश्मन ड्रोन की पहचान कर प्राथमिकता तय करेगा और GCS को जानकारी देगा.
ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन (GCS)
यह पूरे सिस्टम का कमांड सेंटर होगा.
सेंसर से मिली जानकारी को सुरक्षित डेटा लिंक के जरिए ड्रोन कैचर तक भेजेगा.
दुश्मन ड्रोन की टेलीमेट्री जानकारी दिखाएगा.
ऑनबोर्ड माइक्रोप्रोसेसर से टारगेटिंग सॉल्यूशन तैयार करेगा.
लैपटॉप या टैबलेट आधारित इंटरफेस से रियल-टाइम कंट्रोल संभव होगा.
ड्रोन कैचर पूरी तरह ऑटोमेटिक सिस्टम होगा.
GCS से जानकारी मिलते ही लक्ष्य ड्रोन को ट्रैक करेगा.
नेट-कैप्चर मैकेनिज्म से ड्रोन को पकड़कर निष्क्रिय करेगा.
अकेले या इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम के साथ काम कर सकेगा.
इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता भी शामिल सिस्टम में जैमर सब-सिस्टम भी होगा, जो
रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) को ब्लॉक करेगा.
GNSS (GPS) सिग्नल को बाधित या भ्रमित करेगा.
स्टैंडर्ड और नॉन-स्टैंडर्ड फ्रीक्वेंसी बैंड पर काम करेगा.
हर इलाके में तैनाती यह सिस्टम देशभर में मैदान, रेगिस्तान और ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात किया जा सकेगा.
क्या मायने हैं?
ड्रोन युद्ध के बदलते स्वरूप में यह कदम भारतीय सेना की एयर डिफेंस क्षमता को नई मजबूती देगा. छोटे, सस्ते और कम रडार सिग्नेचर वाले ड्रोन अब आधुनिक युद्ध में बड़ा खतरा बन चुके हैं. ऐसे में ड्रोन कैचर सिस्टम भविष्य की चुनौतियों से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है.”