भारतीय सेना ने ड्रोन सुरक्षा के लिए नया टेस्टिंग फ्रेमवर्क बनाया, चीनी पार्ट्स पर सख्ती

The CSR Journal Magazine
भारतीय सेना ने ड्रोन की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए एक नया टेस्टिंग फ्रेमवर्क तैयार किया है। यह कदम ‘सिक्योर बाय डिजाइन’ रणनीति की दिशा में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इसका प्रमुख उद्देश्य स्वदेशी और सुरक्षित ड्रोन तैयार करना है, ताकि भारत भविष्य के युद्ध में तकनीकी रूप से मजबूत रह सके। आधुनिक युद्ध में ड्रोन एक अहम हथियार बन चुके हैं, इसलिए रक्षा मंत्रालय ने इनकी सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।

क्या खास है नए फ्रेमवर्क में?

इस नए फ्रेमवर्क में ड्रोन के महत्वपूर्ण पार्ट्स की पहचान कर उन्हें अलग-अलग स्तरों पर परीक्षण करने की योजना बनाई गई है। इसमें हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों ही शामिल हैं। ड्रोन को सेना में शामिल करने से पहले इन्हें कई परीक्षणों से गुजरना होगा, जिसमें वल्नरेबिलिटी और पेनिट्रेशन टेस्ट, एन्क्रिप्शन व सिक्योर बूट टेस्ट, और कोड सिग्नेचर वैलिडेशन शामिल हैं। इन सभी टेस्ट में उत्तीर्ण होने के बाद ही ड्रोन सेना में शामिल किया जाएगा।

शुरुआत से लागू होगा सिस्टम

यह फ्रेमवर्क आरएफआई (सूचना के लिए अनुरोध) चरण से ही लागू किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि कंपनियां शुरुआत से ही सुरक्षित और मानकों के अनुरूप ड्रोन विकसित करें। इससे ड्रोन की पात्रता सुनिश्चित होगी और सुरक्षा की दिशा में एक ठोस कदम उठाया जा सकेगा।

बड़े खतरे क्या हैं?

फ्रेमवर्क में यह भी उल्लेख किया गया है कि दुश्मन ड्रोन के कम्युनिकेशन को इंटरसेप्ट कर सकते हैं। इसके साथ ही वे फर्जी कमांड भेजकर ड्रोन का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले सकते हैं। GPS जैमिंग, डेटा चोरी, और साइबर टेकओवर जैसे गंभीर खतरों को भी फ्रेमवर्क में शामिल किया गया है। ये सभी खतरे ड्रोन संचालन के लिए चुनौती पेश करते हैं।

संवेदनशील भागों की पहचान

ड्रोन के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों को सबसे अधिक जोखिम वाला माना गया है। इनमें फ्लाइट कंट्रोलर, फर्मवेयर, GPS/INS सिस्टम और सेंसर शामिल हैं। इन में से किसी एक की कमजोरी वायु वाहन के संपूर्ण नियंत्रण को खतरे में डाल सकती है, जिससे संभावित नुकसान भी हो सकता है।

चीनी पार्ट्स पर सख्ती

भारतीय सेना ने पूर्व में चीनी पार्ट्स वाले कई ड्रोन कॉन्ट्रैक्ट रद्द किए हैं। अब कंपनियों को प्रमाणित करना होगा कि उनके ड्रोन में न तो चीनी कंपोनेंट्स हैं और न ही कोई मैलिशियस कोड। हालांकि, भारतीय उत्पादन की प्रगति को देखते हुए माइक्रोचिप्स और कम्युनिकेशन उपकरणों का पूरी तरह स्वदेशी उत्पादन अभी संभव नहीं है, इसलिए सर्टिफिकेशन और टेस्टिंग सिस्टम को मजबूती दी जा रही है।

किस ड्रोन पर होगा नियम लागू?

फिलहाल, यह फ्रेमवर्क छोटे ड्रोन जैसे माइक्रो, मिनी, और स्मॉल क्वाडकॉप्टर और हेक्साकॉप्टर पर लागू होगा। इस कदम से भारतीय सेना की सुरक्षा और तकनीकी मजबूती में वृद्धि होने की संभावना है, जिससे देश की सैन्य क्षमताओं में सुधार होगा।

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