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February 8, 2026

भारत-अमेरिका डील पर किसानों का महाविस्फोट: “आत्मसमर्पण नहीं, अब आंदोलन होगा” — सड़कों पर उतरेंगे लाखों किसान

The CSR Journal Magazine
भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते को लेकर किसान संगठनों में गहरी नाराजगी है। किसान संगठनों का कहना है कि यह डील भारत के किसानों के लिए आत्मसमर्पण के समान है। देशभर में 12 फरवरी को आयोजित होने वाले विरोध प्रदर्शन में लाखों किसान शामिल होंगे। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने इस समझौते को भारतीय कृषि के भविष्य के लिए खतरा बताया है। इसके खिलाफ आवाज उठाने के लिए किसानों ने सड़कों पर उतरने का तय किया है।

आत्मसमर्पण का आरोप

किसान संगठनों ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल पर सीधा हमला किया है। उनका कहना है कि समझौते के तहत अमेरिका के सामने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया गया है। SKM ने मांग की है कि पीयूष गोयल को अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए। किसानों का कहना है कि यह समझौता उनकी रोजी-रोटी पर प्रभाव डालेगा और उन्हें अमेरिकी मल्टीनेशनल कंपनियों के सामने कमजोर करेगा।

विरोध का व्यापक फैलाव

SKM ने ऐलान किया है कि पूरे देश के गांवों में विरोध प्रदर्शन होंगे। किसानों ने यह भी कह दिया है कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री के पुतले जलाएंगे। इस प्रदर्शन को लेकर सभी किसान संगठनों में बड़ा उत्साह है और उन्हें उम्मीद है कि इससे सरकार के खिलाफ दबाव बनेगा।

डील का प्रभाव

अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) के नेता कृष्णा प्रसाद ने चेतावनी दी है कि यह व्यापार समझौता कृषि क्षेत्र में गंभीर समस्याओं का सामना करने वाले किसानों को और मुश्किलों का सामना कराएगा। उन्होंने बताया कि यह डील सूखे डिस्टिलर अनाज जैसे सामानों के लिए बाजार खोल रही है, जो सीधे तौर पर भारतीय किसानों के हित में नहीं है।

SKM का कड़ा बयान

संयुक्त किसान मोर्चा ने केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए कहा है कि वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के दावों के विपरीत यह समझौता कृषि और डेयरी उत्पादों को भी प्रभावित करेगा। SKM के अनुसार, इस डील के कारण भारतीय बाजार में अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए दरवाजे खुल जाएंगे, जिससे भारतीय किसानों को भारी नुकसान होगा।

किसानों की चिंताएं

किसान संगठनों ने बताया है कि यह समझौता केवल अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया है। भारतीय किसान, जो पहले से ही गंभीर आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं, और प्रभावित होंगे। सरकार को इस मुद्दे पर संवेदनशीलता से ध्यान देने की आवश्यकता है, लेकिन किसान संगठनों का मानना है कि ऐसा नहीं हो रहा है।
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