दुनिया के कई बड़े शहर चेन्नई, तेहरान, साओ पाउलो, मेक्सिको सिटी और केपटाउन गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। नदियां और झीलें सिकुड़ रही हैं, भूजल भंडार तेजी से खाली हो रहे हैं और जलवायु परिवर्तन के साथ अनियोजित शहरीकरण ने स्थिति को विकराल बना दिया है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल प्रबंधन में तुरंत सुधार नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में सामाजिक असंतोष और आर्थिक संकट गहरा सकता है।
शहरीकरण और वेटलैंड का विनाश: विकास की भारी कीमत
तेजी से बढ़ते शहर जल संकट की बड़ी वजह बन रहे हैं। उदाहरण के तौर पर चेन्नई, जहां कभी जलाशयों और आर्द्रभूमि (वेटलैंड) की भरमार थी, आज पानी के लिए जूझ रहा है। 2019 में यहां ‘डे ज़ीरो’ जैसी स्थिति घोषित करनी पड़ी, जब शहर के प्रमुख जलाशय सूख गए थे। विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में बड़े पैमाने पर कंक्रीट निर्माण मकान, अस्पताल, स्टेडियम और सड़कें प्राकृतिक जलस्रोतों और वेटलैंड पर खड़े किए गए।
परिणामस्वरूप वर्षा का पानी जमीन में रिसकर भूजल को रिचार्ज नहीं कर पाता।
वेटलैंड प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करते हैं, जो अतिरिक्त वर्षा जल को सोख लेते हैं और बाढ़ के खतरे को कम करते हैं। लेकिन जब जमीन कंक्रीट से ढक जाती है, तो पानी बहकर नालों और सड़कों पर भर जाता है।
2015 की चेन्नई बाढ़ ने दिखा दिया कि अनियोजित विकास किस तरह आपदा को जन्म देता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भी बताती है कि दुनिया ने पिछले दशकों में विशाल वेटलैंड क्षेत्र खो दिया है। यह केवल पर्यावरणीय क्षति नहीं, बल्कि जल सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।
भूजल का दोहन और कृषि का दबाव
विश्व स्तर पर लगभग 70 प्रतिशत ताजा पानी का उपयोग कृषि में होता है। ब्राज़ील जैसे देशों में बड़े पैमाने पर खेती और पशुपालन के कारण भूजल स्तर तेजी से गिरा है। ब्राज़ील को विश्व का ‘ब्रेड बास्केट’ कहा जाता है क्योंकि यह कॉफी, सोयाबीन, गन्ना और गोमांस का बड़ा उत्पादक है।
लेकिन सिंचाई के लिए नदियों और भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन निचले क्षेत्रों के शहरों के लिए संकट पैदा कर रहा है। NASA के वैज्ञानिकों ने उपग्रह आंकड़ों के आधार पर संकेत दिए हैं कि कुछ क्षेत्रों में सैकड़ों क्यूबिक किलोमीटर भूजल कम हुआ है। वर्षावनों की कटाई ने स्थिति और बिगाड़ी है। पेड़ वर्षा जल को जमीन में समाहित करने में मदद करते हैं, लेकिन जब जंगल कटते हैं तो पानी तेजी से बहकर नदियों में चला जाता है, जिससे भूजल रिचार्ज कम हो जाता है।
इसका असर शहरी इलाकों पर भी पड़ रहा है। साओ पाउलो जैसे महानगरों में हाल के वर्षों में गंभीर जल संकट देखा गया है। यदि खेती के आधुनिक और किफायती सिंचाई तरीकों को नहीं अपनाया गया, तो यह संकट और गहरा सकता है।
जलवायु परिवर्तन और नई तकनीकों का बढ़ता प्रभाव
जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा और बाढ़ दोनों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ी है। कभी अत्यधिक वर्षा, तो कभी लंबे सूखे न दोनों स्थितियों में जल प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटर जैसे नए उद्योग भी जल खपत बढ़ा रहे हैं। बड़े डेटा सेंटरों को ठंडा रखने और बिजली उत्पादन के लिए भारी मात्रा में पानी चाहिए। अनुमान है कि आने वाले समय में एआई उद्योग को अरबों क्यूबिक मीटर पानी की आवश्यकता होगी। अमेरिका के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में डेटा सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं, जबकि ये इलाके पहले से जल संकट झेल रहे हैं। इससे स्थानीय जल और बिजली की कीमतों पर भी दबाव पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी प्रगति जरूरी है, लेकिन उद्योगों की स्थापना जल उपलब्धता को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए, अन्यथा आम नागरिकों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
समाधान की राह सिंगापुर मॉडल से सीख
जहां कई शहर जल संकट से जूझ रहे हैं, वहीं सिंगापुर ने प्रभावी जल प्रबंधन से मिसाल पेश की है। सीमित प्राकृतिक जलस्रोतों के बावजूद, इस देश ने दीर्घकालिक योजना के तहत ‘फोर टैप्स पॉलिसी’ अपनाई। इस नीति में चार प्रमुख स्रोत शामिल हैं आयातित पानी, वर्षा जल संचयन, पुनर्चक्रित (रीसाइकल) पानी और समुद्री जल का विलवणीकरण। सिंगापुर ने न केवल आधुनिक जल शोधन संयंत्र स्थापित किए, बल्कि नागरिकों को पानी बचाने के लिए जागरूक भी किया।
सरकार ने पानी के उपयोग पर कर बढ़ाए, लेकिन साथ ही जल-संरक्षण उपकरण खरीदने के लिए प्रोत्साहन भी दिया। दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता और नीतिगत निरंतरता ने इन योजनाओं को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।
विशेषज्ञों का मानना है कि अन्य देश भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसे मॉडल अपना सकते हैं। वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण और भूजल रिचार्ज जैसी पहलों को प्राथमिकता देना समय की मांग है।
दुनिया के कई बड़े शहरों में सूखते नल केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक चेतावनी हैं। अनियोजित शहरीकरण, अत्यधिक भूजल दोहन, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती औद्योगिक मांग ने मिलकर जल संकट को गंभीर बना दिया है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो पानी की कमी सामाजिक असंतोष और संघर्ष का कारण बन सकती है। अब आवश्यकता है संतुलित विकास, वैज्ञानिक जल प्रबंधन और जनभागीदारी की ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

