सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बावजूद चुनावी राजनीति में फ्रीबीज की कतार

The CSR Journal Magazine
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बावजूद, राजनीतिक दलों के बीच ‘फ्रीबीज कल्चर’ खत्म नहीं हो रहा है। चुनावों में वोट पाने के लिए पार्टियां न सिर्फ लोकलुभावन वादे कर रही हैं, बल्कि जरूरतमंदों के लिए रेवड़ी बांटने का काम भी जारी है। इससे राज्यों पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। इस स्थिति ने असली मुद्दों को पीछे छोड़ दिया है, जो राष्ट्र के भविष्य के लिए चिंता का विषय बन गया है।

असम में बीजेपी का संकल्प पत्र: क्या कहा गया?

बीजेपी ने असम चुनाव के लिए मंगलवार को अपना संकल्प पत्र जारी किया है। इस मौके पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और पूर्व सीएम सर्वानंद सोनोवाल मौजूद थे। बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में 2 लाख नए सरकारी रोजगार, 18,000 करोड़ का बाढ़ सुरक्षा मिशन, गरीब परिवारों के लिए मुफ्त राशन जैसे कई लोकलुभावन वादे किए हैं।

बंगाल और तमिलनाडु में फ्रीबीज का महाकुम्भ

चुनावी राज्यों में फ्रीबीज की होड़ तेज हो गई है। बंगाल में टीएमसी और बीजेपी कैश क्रेडिट से दांव खेल रही हैं, जबकि तमिलनाडु में रेफ्रिजरेटर और कैश कूपन दिए जा रहे हैं। कांग्रेस ने असम में महिलाओं को उद्यम शुरू करने के लिए 50,000 रुपये देने का वादा किया है। इसके विपरीत, बीजेपी की ओर से महिलाओं के लिए 1250 रुपये देने की योजना है।

केरल: फ्रीबीज से बचने का प्रयास

केरल एक ऐसा राज्य है, जहां दोनों राजनीतिक गठबंधनों ने मुफ्त योजनाओं से परहेज किया है। वहां का ध्यान इंफ्रास्ट्रक्चर पर है, जो शायद अन्य राज्यों के मुकाबले एक अलग दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। बावजूद इसके, राजनीतिक शोर में असली मुद्दे धूमिल होते जा रहे हैं।

फ्रीबीज का अर्थ और इसके प्रभाव

फ्रीबीज यानी मुफ्त की योजनाएं हमेशा जनता की जरूरत की भांति पेश की जाती हैं, लेकिन असल में ये वोट हासिल करने का एक साधन बन गई हैं। राज्यों पर बढ़ता कर्ज इस बात का इशारा करता है कि राजनीतिक दल अपनी प्राथमिकताओं से भटक रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि बंगाल पर करीब 8 लाख करोड़ रुपये, और तमिलनाडु पर साढ़े 9 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है।

सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी

19 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने फ्रीबीज कल्चर पर सख्त टिप्पणी की थी। CJI ने कहा कि घाटे में चल रहे राज्य मुफ्त योजनाएं बांट रहे हैं, जिससे आर्थिक विकास बाधित हो रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि मुफ्त बिजली-पानी देने से लोगों में काम करने की आदत खत्म हो जाएगी। रिजर्व बैंक भी ऐसी योजनाओं के संबंध में चिंता जता चुका है।

आगे क्या होगा?

भविष्य में यह देखना होगा कि क्या राजनीतिक दल अपने वादों को पूरा करने में सक्षम होते हैं या फिर इसी तरह की फ्रीबीज का खेल चलता रहेगा। असली विकास और रोजगार के मुद्दों को प्राथमिकता मिलती है या फ्रीबीज संस्कृति और वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा मिलेगा।

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