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January 21, 2026

डिजिटल अरेस्ट’ का जाल दिल्ली में बुज़ुर्गों से 22 करोड़ की ठगी, साइबर सिंडिकेट तक पहुंचना क्यों बना चुनौती

The CSR Journal Magazine
दिल्ली के पॉश इलाके ग्रेटर कैलाश-2 में एक सप्ताह के भीतर ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर दो बुज़ुर्गों से करीब 22 करोड़ रुपये की ठगी ने देश में साइबर अपराध की भयावह तस्वीर सामने रख दी है। फर्जी पुलिस, डर और राष्ट्र सुरक्षा के नाम पर चलाए जा रहे इस स्कैम में संगठित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की भूमिका सामने आ रही है, जिस तक पहुंचना जांच एजेंसियों के लिए बेहद कठिन साबित हो रहा है।

एक कॉल से शुरू हुआ डिजिटल अरेस्ट

24 दिसंबर को 79 वर्षीय एनआरआई डॉक्टर इंदिरा तनेजा के पास आए एक फोन कॉल ने उनकी ज़िंदगी को 15 दिनों के लिए पूरी तरह बदल दिया। कॉल करने वाले ने खुद को ट्राई का अधिकारी बताते हुए उनके नंबर पर अश्लील कॉल और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाए। इसके बाद फर्जी एफआईआर और कथित पुलिस अधिकारी से वीडियो कॉल कराई गई। वर्दी और पुलिस चिन्हों के साथ बैठे इस व्यक्ति ने उन्हें ‘संदिग्ध’ बताते हुए जांच में सहयोग का दबाव बनाया। डर और भ्रम के माहौल में डॉक्टर इंदिरा और उनके पति ओम तनेजा को अपने ही घर में ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा गया।

डर, भरोसा और राष्ट्र सुरक्षा का हथकंडा

ठगों ने सिर्फ कानून का डर ही नहीं दिखाया, बल्कि राष्ट्र सुरक्षा का भावनात्मक कार्ड भी खेला। डॉक्टर इंदिरा और उनके पति, जो अमेरिका से लौटकर भारत में समाज सेवा कर रहे थे, यह मान बैठे कि वे देशहित में जांच में मदद कर रहे हैं। स्कैमर्स ने दावा किया कि बड़े मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क से उनका नाम जुड़ा है और अगर बात बाहर गई तो उनकी और उनके बच्चों की जान को खतरा हो सकता है। लगातार वीडियो कॉल के जरिए निगरानी, समय-समय पर निर्देश और भरोसे ने उन्हें पूरी तरह मानसिक रूप से जकड़ लिया।

14.85 करोड़ से 12 हजार खातों तक

इन 15 दिनों में दंपती के सात बैंक खातों से 14.85 करोड़ रुपये आठ ट्रांजैक्शन में देश के अलग-अलग हिस्सों के खातों में ट्रांसफर कराए गए। दिल्ली पुलिस के अनुसार, यह रकम पहले सैकड़ों और फिर हजारों खातों में बिखेर दी गई। यही साइबर अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत है मल्टी-लेयर मनी ट्रेल। समय पर शिकायत न मिलने के कारण पुलिस केवल करीब 20 प्रतिशत रकम ही फ्रीज कर पाई। इसी दौरान उसी इलाके में रहने वाली एक बुज़ुर्ग महिला कारोबारी से भी करीब सात करोड़ रुपये ठग लिए गए।

स्कैमर तक पहुंचना क्यों है मुश्किल

दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, यह सिर्फ ठगी का तरीका है। लेकिन असली चुनौती इस नेटवर्क के ‘टॉप लेयर’ तक पहुंचने की है। साइबर एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ऐसे स्कैम अब संगठित अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट चला रहे हैं, जिनके मास्टरमाइंड अक्सर देश से बाहर होते हैं। भारत में पुलिस ज्यादातर उन लोगों तक पहुंच पाती है जिन्होंने लालच में आकर अपने बैंक खाते किराए पर दिए होते हैं। कई बार इन्हें खुद भी नहीं पता होता कि उनका खाता अपराध में इस्तेमाल हो रहा है।

बैंक, सरकार और सिस्टम पर सवाल

पीड़ितों का आरोप है कि बार-बार बड़े ट्रांजैक्शन के बावजूद बैंक अधिकारियों ने कोई अलर्ट नहीं दिया।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर बड़े लेनदेन पर डिफर्ड पेमेंट सिस्टम और बैंकों की जवाबदेही तय हो, तो ऐसे मामलों में नुकसान कम किया जा सकता है। सरकार का दावा है कि राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल, सस्पेक्ट रजिस्ट्री और 1930 हेल्पलाइन के जरिए लाखों संदिग्ध खाते ब्लॉक किए गए हैं और हजारों करोड़ की ठगी रोकी गई है। बावजूद इसके, डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों का बढ़ना बताता है कि जागरूकता, त्वरित रिपोर्टिंग और बैंकिंग सतर्कता अब भी सबसे कमजोर कड़ी हैं।
डिजिटल अरेस्ट कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि डर और तकनीक के सहारे चलाया जा रहा संगठित साइबर अपराध है। जब तक आम लोग, बैंक और जांच एजेंसियां एक साथ सतर्क नहीं होंगी, तब तक ऐसे सिंडिकेट बुज़ुर्गों और कमजोर वर्गों को निशाना बनाते रहेंगे।

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