चीन और पाकिस्तान की उड़ी नींद- भारत ने शुरू किया 600 हाई-कैलिबर एरियल बमों का निर्माण, आत्मनिर्भरता की ओर एक और कदम

The CSR Journal Magazine

भारत बना रहा है 1000 किलो के 600 ‘सुपर बंकर बस्टर बम’, वायु सेना की बढ़ेगी ताकत

भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता को और मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। देश में 600 स्वदेशी 1000 किलो के सुपर बंकर बस्टर बम बनाए जाएंगे। यह बम ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत तैयार किए जा रहे हैं और इनकी विनाशकारी क्षमता अमेरिका के Mk-84 बम के बराबर होगी। रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) जारी कर दिया है, जो भारत की सुरक्षा तैयारियों में एक नया अध्याय जोड़ देगा।

सुपर बंकर बस्टर बम की खासियत

आत्मनिर्भर भारत के तहत रक्षा मंत्रालय ने इन स्वदेशी बमों के निर्माण की मंजूरी दे दी है। ये बम इतने शक्तिशाली हैं कि जमीन के कई फीट नीचे छिपे दुश्मन के अड्डों को भी पल भर में राख कर देंगे। सबसे खास बात ये है कि इन्हें हमारे सुखोई-30 MKI और राफेल जैसे घातक लड़ाकू विमानों से दागा जा सकेगा। ये बंकर बस्टर बम दुश्मन देशों के लिए खतरनाक साबित होंगे। इनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि ये भारी मात्रा में विस्फोटक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। धमाके के समय उत्पन्न दबाव बंकरों और मजबूत ठिकानों को ध्वस्त कर सकता है। इनका उपयोग दुश्मन के एयरबेस, सैन्य मुख्यालय, और कंक्रीट के बंकरों को पूरी तरह से नष्ट करने के लिए किया जाएगा।

प्रोजेक्ट का दो चरणों में क्रियान्वयन

रक्षा मंत्रालय ने इस महत्वाकांक्षी योजना को दो चरणों में बांटा है। पहले चरण में, बम के 6 प्रोटोटाइप (लाइव और डमी) विकसित किए जाएंगे, जिनका परीक्षण भारत की टेस्ट रेंज में किया जाएगा। दूसरे चरण में, सफल ट्रायल के बाद टेंडर (RFP) जारी किया जाएगा, जिससे कुल 600 बमों की खरीद की जा सकेगी।

सुपर बम’ और आत्मनिर्भरता का नया आकाश

आज के दौर में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि तकनीक और मारक क्षमता के स्तर पर लड़े जाते हैं। आधुनिक युद्ध तंत्र में ‘बंकर बस्टर’ बमों की भूमिका निर्णायक होती है। ये वे हथियार हैं जो जमीन के कई फीट नीचे कंक्रीट के मोटे ढांचों और भूमिगत सैन्य अड्डों को ध्वस्त करने की क्षमता रखते हैं। अब तक भारत को ऐसे भारी-भरकम और उच्च-क्षमता वाले बमों के लिए विदेशी बाजारों, विशेषकर अमेरिका और रूस पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन 600 स्वदेशी बमों का यह प्रोजेक्ट इस निर्भरता को हमेशा के लिए खत्म कर देगा। चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए, वायुसेना को ऐसे हथियारों की सख्त जरूरत थी जो दुश्मन के अभेद्य किलों को पल भर में राख कर सकें। ये नए बम हमारे सुखोई-30MKI और राफेल जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की शक्ति को दोगुना कर देंगे।

डिजाइन और डेवलपमेंट से स्वदेशीकरण की ओर बढ़ते कदम

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन बमों का निर्माण भारतीय निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के सहयोग से होगा, जिससे देश के रक्षा उद्योग (Defense Industrial Base) को जबरदस्त मजबूती मिलेगी। इस प्रोजेक्ट के तहत कम से कम 50 फीसदी स्वदेशी सामग्री का उपयोग अनिवार्य है, जो भारतीय स्टार्टअप और MSMEs के लिए एक सुनहरा मौके के रूप में उभरेगा। इससे भारतीय उद्योगों को रक्षा क्षेत्र में कदम रखने का एक सुनहरा अवसर मिलेगा, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ को और मजबूती मिलेगी।

स्वदेशी शक्ति का संदेश

1,000 किलो के इन ‘हाई-कैलिबर’ बमों का स्वदेशीकरण केवल लागत बचाने का मामला नहीं है, बल्कि यह संकट के समय निर्बाध आपूर्ति (Supply Chain) सुनिश्चित करने की गारंटी भी है। यूक्रेन-रूस युद्ध जैसे वैश्विक संकटों ने दुनिया को सिखाया है कि रक्षा के क्षेत्र में दूसरे देशों पर निर्भर रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है। भारत अब केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि निर्माता बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। 600 सुपर बमों का यह बेड़ा भारतीय वायुसेना को वह ‘किलर इंस्टिंक्ट’ प्रदान करेगा, जो किसी भी दुस्साहस का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए अनिवार्य है। यह कदम स्पष्ट संदेश देता है कि नए भारत की सुरक्षा अब पूरी तरह स्वदेशी सुरक्षा कवच के भीतर सुरक्षित है।

आत्मनिर्भर भारत की ओर एक और कदम

भारत वर्तमान में इस श्रेणी के भारी बमों के लिए विदेशी बाजार पर निर्भर है। इस प्रोजेक्ट की सफलता न केवल विदेशी मुद्रा बचाएगी, बल्कि युद्ध जैसी परिस्थितियों में भारत को किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इस पूरी प्रक्रिया में डिजाइन से लेकर अंतिम कॉन्ट्रैक्ट तक करीब 2.5 साल का समय लग सकता है। इससे भारतीय वायुसेना की ताकत में बेहद इज़ाफा होगा, और भारत एक वैश्विक डिफेंस हब बनने की दिशा में तेजी से बढ़ेगा।

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