भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने कहा है कि न्यायिक नेतृत्व इस कारण कमजोर नहीं होता कि जज परफेक्ट नहीं हैं, बल्कि तब प्रभावित होता है जब जज खुद को पूरी तरह परफेक्ट दिखाने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा कि जजों में विनम्रता होना बेहद जरूरी है और उन्हें अपनी सीमाएं पहचानकर गलतियों से सीखना चाहिए।
शुक्रवार रात दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ ज्यूडिशियल एजुकेटर्स (CJE) की 11वीं द्विवार्षिक बैठक के उद्घाटन समारोह में मुख्य भाषण देते हुए CJI ने न्यायिक नेतृत्व को समझने के नजरिए में बदलाव की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका केवल फैसले सुनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लगातार सीखने, सुधार करने और आगे बढ़ने की प्रक्रिया भी है।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि जज और न्यायिक संस्थाएं दोनों ही मानवीय हैं और उनसे भी भूल हो सकती है। लेकिन एक मजबूत न्यायिक व्यवस्था वही होती है जो अपनी गलतियों को स्वीकार कर, उनसे सीखकर खुद को बेहतर बनाती है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि दिखावे और अहंकार से न्यायिक नेतृत्व को नुकसान पहुंचता है।
अपने भाषण में CJI ने सुझाव दिया कि राष्ट्रमंडल (कॉमनवेल्थ) देशों में न्यायिक शिक्षा को मजबूत करने के लिए एक विशेष संस्था बनाई जानी चाहिए। यह संस्था बार (वकील) और बेंच (जज) के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने में मदद करेगी। उन्होंने कहा कि इस तरह की पहल से न्यायिक प्रशिक्षण, अनुभव साझा करने और कानूनी प्रक्रियाओं में सुधार को बढ़ावा मिलेगा।
CJI ने यह भी कहा कि न्यायपालिका में निरंतर प्रशिक्षण और आधुनिक चुनौतियों के अनुसार खुद को अपडेट रखना जरूरी है। इसके लिए न्यायिक शिक्षा प्रणाली को मजबूत करना होगा।
उन्होंने कहा कि न्यायिक नेतृत्व का मूल आधार ईमानदारी, विनम्रता और जिम्मेदारी है। जब जज अपनी सीमाओं को स्वीकार कर सुधार की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तभी न्यायपालिका का विश्वास और प्रभाव मजबूत होता है।