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January 17, 2026

जहां चलता था माओवादियों का हुक्म, वहां बनाई जा रही सड़क, बस्तर का 95% हिस्सा हिंसा से आज़ाद

The CSR Journal Magazine
वर्ष 2025 बस्तर के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ है। जिस क्षेत्र को कभी माओवादी हिंसा का गढ़ माना जाता था, वहां अब हालात तेजी से बदल चुके हैं। सुरक्षा बलों की सटीक रणनीति, मजबूत खुफिया तंत्र और लगातार अभियानों के चलते बस्तर का लगभग 95 प्रतिशत भूभाग माओवादी प्रभाव से मुक्त कर लिया गया है। चार दशकों से चला आ रहा नक्सली आंदोलन अब अपने अंतिम चरण में दिखाई दे रहा है।

कभी ‘रेड कॉरिडोर’, आज शांति की ओर बढ़ता बस्तर

एक समय था जब जगदलपुर जैसे संभागीय मुख्यालय के आसपास तक माओवादियों की गहरी पकड़ मानी जाती थी। वर्ष 2005 से 2015 के बीच तो पूरा बस्तर, शहरी क्षेत्रों को छोड़कर, माओवादियों का सुरक्षित ठिकाना समझा जाता था। लेकिन 2025 के अंत तक स्थिति पूरी तरह पलट चुकी है। अब माओवादी प्रभाव केवल 650 से 750 वर्ग किलोमीटर के सीमित और दुर्गम इलाकों तक सिमट गया है, जो कुल क्षेत्रफल का लगभग पांच प्रतिशत ही है।

अबूझमाड़ से इंद्रावती तक सिकुड़ता दायरा

वर्तमान में माओवादी गतिविधियां सुकमा–बीजापुर सीमा के कुछ हिस्सों, कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों, अबूझमाड़ और इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान के आसपास के दुर्गम क्षेत्रों तक सीमित हैं। इन इलाकों में भी सुरक्षा बलों की निरंतर मौजूदगी और सड़क निर्माण जैसे विकास कार्यों ने माओवादियों के लिए सुरक्षित पनाहगाहें लगभग खत्म कर दी हैं। जंगल और पहाड़ों को चीरकर बनाई जा रही सड़कें अब राज्य की पहुंच का प्रतीक बन चुकी हैं।

टेकुलगुड़ेम हमले के बाद बदली रणनीति

तीन वर्ष पहले सुकमा के टेकुलगुड़ेम में हुए बड़े माओवादी हमले के बाद सुरक्षा बलों ने निर्णायक कार्रवाई का लक्ष्य तय किया था। तब इस लक्ष्य को अव्यावहारिक माना जा रहा था, लेकिन 2025 ने साबित कर दिया कि यह संघर्ष निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। माओवादी संगठन का ढांचा बिखर चुका है और उसका वैचारिक तथा सैन्य नेतृत्व गंभीर रूप से कमजोर हो गया है।

शीर्ष नेतृत्व का सफाया, संगठन दिशाहीन

इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि माओवादी संगठन के शीर्ष नेताओं का खात्मा रहा। महासचिव और रणनीतिकार बसवा राजू का मई 2025 में मारा जाना संगठन के लिए बड़ा झटका था। इसके बाद हिड़मा सहित कई कुख्यात कमांडरों के मारे जाने से कैडर का मनोबल टूट गया। पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति स्तर के 11 से अधिक नेताओं के खात्मे ने संगठन की रीढ़ तोड़ दी।

आत्मसमर्पण और विकास ने बदला माहौल

सिर्फ मुठभेड़ ही नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति ने भी बड़ा असर डाला है। वर्ष 2025 में 1,562 माओवादियों ने हथियार छोड़ दिए, जो पिछले वर्ष की तुलना में दोगुना है। 210 माओवादियों का सामूहिक आत्मसमर्पण बस्तर में बदलते जनमानस का प्रमाण है। जहां कभी जनअदालतें लगती थीं, वहां अब स्कूल, बैंक, राशन दुकानें और आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं।

सुरक्षा कैंप बने विकास के केंद्र

बस्तर में स्थापित 52 नए सुरक्षा कैंप अब केवल सैन्य ठिकाने नहीं रह गए हैं। इन्हें ‘इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट सेंटर’ के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां सुरक्षा के साथ-साथ बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। आईईडी निष्क्रिय करने और हथियारों की बरामदगी से क्षेत्र को विस्फोटों के खतरे से काफी हद तक मुक्त किया गया है।

मार्च 2026 तक पूर्ण उन्मूलन का लक्ष्य

बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम के अनुसार, मार्च 2026 तक वामपंथी उग्रवाद के पूर्ण उन्मूलन का लक्ष्य तय किया गया है। उनका कहना है कि माओवादियों के पास अब हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का अंतिम अवसर है। 2025 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बस्तर अब डर से नहीं, विकास और शांति के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।
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