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February 19, 2026

Dehradun नस्लीय हत्या केस पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, ‘हम भारतीय हैं’ सवाल बना बहस का केंद्र

The CSR Journal Magazine
त्रिपुरा के युवा MBA छात्र अंजेल चकमा की हत्या के बाद, नस्लीय हिंसा का मामला अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। 28 दिसंबर, 2022 को दायर जनहित याचिका में अंजेल चकमा की निर्मम हत्या का जिक्र है, जो देहरादून के सेलाक्वी इलाके में 26 दिसंबर, 2022 को नस्लीय हमले के कारण हुई। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे महत्वपूर्ण बताया, और निर्देश दिया कि इसे संबंधित प्राधिकरण के समक्ष पेश किया जाए।

घृणा अपराधों के प्रति संवेदनशीलता

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह कहा कि जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दे गंभीर हैं। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि नस्लीय भेदभाव और हिंसा से निपटने में संवैधानिक विफलता की न्यायिक जांच की जानी चाहिए। इसमें यह भी कहा गया कि अंजेल चकमा ने हमले के दौरान सवाल उठाया, “हम भारतीय हैं, हमें कौन सा सर्टिफिकेट दिखाना होगा?” यह सवाल भारतीय नागरिकता और अधिकारों पर आधारित था।

शासन की जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नस्ल, क्षेत्र, लिंग और जाति के आधार पर भेदभाव सीधे तौर पर नागरिकों के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे का समाधान अहम है और इसे प्रभावी तरीके से हल किया जाना चाहिए। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी को इस याचिका पर विचार करने हेतु उचित निर्देश दिए गए हैं, ताकि इसे सही प्राधिकारी को भेजा जा सके।

संविधानिक विफलता की मांग

याचिका में बताया गया कि पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के खिलाफ हो रही हिंसा और भेदभाव को रोकने हेतु संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1) (A) एवं (G) और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो रहा है। याचिकाकर्ता ने इसे गंभीरता से लिया है, और इसके समाधान के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। विशेष रूप से, एंजेल चकमा के मामले ने इस विमर्श को और भी अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।

राजनीतिक असंवेदनशीलता का मुद्दा

वकील अनूप प्रकाश अवस्थी ने कहा कि इस मुद्दे को संसद में भी उठाया गया था, लेकिन सांसदों ने इस तरह के घृणा अपराधों से निपटने के लिए कोई एजेंसी बनाने से इनकार कर दिया। इस स्थिति ने नागरिकों में हताशा बढ़ाई है, खासकर उन समुदायों के बीच जो इस प्रकार के भेदभाव का सामना कर रहे हैं।

असहायता की महसूस

अंजेल चकमा की हत्या के बाद, स्थानीय लोगों में भय और असुरक्षा की भावना पनपी है। उनके दोस्तों और परिवार के सदस्यों ने कहा कि चकमा की जान बचाने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। यह घटना समाज में गहरी चिंता का कारण बन गई है।

अदालत का अंतिम फैसला

उच्चतम न्यायालय ने अंततः जनहित याचिका को सुनवाई के लिए ठुकरा दिया और कहा कि इसे सक्षम प्राधिकारी के पास लाना उचित होगा। आयोग ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता अपनी याचिका की सॉफ्ट कॉपी अटॉर्नी जनरल के कार्यालय में जमा कर सकता है। यह सभी घटनाएं वर्तमान में सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं और न्याय की आवश्यकता को उजागर करते हैं।
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