इलाहाबाद हाई कोर्ट की बड़ी उपलब्धि, 1 लाख फैसलों का हिंदी अनुवाद पूरा; अब आम लोग भी आसानी से समझ सकेंगे न्याय

The CSR Journal Magazine
न्याय की भाषा आम लोगों के लिए आसान बनाने की दिशा में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। अब तक हाई कोर्ट के एक लाख फैसलों का हिंदी में अनुवाद किया जा चुका है। 5 अक्टूबर 2026 तक पूरे हुए इन अनुवादों को कोर्ट की वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध कराया गया है। इससे उन लोगों को राहत मिलेगी, जिन्हें अंग्रेजी में लिखे कानूनी फैसलों को समझने में परेशानी होती है। हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली ने एक लाखवें फैसले को स्वयं वेबसाइट पर अपलोड किया। इस उपलब्धि के मौके पर ‘द वर्नाक्युलर वायस ऑफ जस्टिस’ नाम की स्मारिका का विमोचन भी किया गया। यह पहल न्यायिक फैसलों को आम लोगों तक उनकी भाषा में पहुंचाने के प्रयासों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस उपलब्धि को हासिल करने में हाई कोर्ट के सुवास प्रकोष्ठ की अहम भूमिका रही है। एआई असिस्टेड लीगल ट्रांसलेशन एडवाइजरी, ई-एचसीआर और आईएलआर कमेटी के सहयोग से फैसलों के हिंदी अनुवाद का काम आगे बढ़ाया जा रहा है।

2023 में शुरू हुई थी पहल, अब एक लाख फैसलों तक पहुंचा आंकड़ा

इलाहाबाद हाई कोर्ट में हिंदी अनुवाद का यह काम एक तय प्रक्रिया के तहत शुरू हुआ था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की पहल पर 23 जनवरी 2023 को सभी हाई कोर्ट में फैसलों के अनुवाद के लिए कमेटियां बनाने का पत्र भेजा गया था। इसके बाद 16 अगस्त 2023 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुवास सेल की स्थापना हुई। 23 अगस्त 2023 को पहला हिंदी अनुवाद वेबसाइट पर अपलोड किया गया। इसके बाद लगातार इस काम को आगे बढ़ाया गया। 12 दिसंबर 2025 को 50 हजारवें फैसले का हिंदी अनुवाद पूरा हुआ था। इसके बाद अगले कुछ महीनों में अनुवाद की संख्या बढ़कर एक लाख तक पहुंच गई। इस उपलब्धि के दौरान कई न्यायमूर्ति मौजूद रहे। न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा, अतुल श्रीधरन, सिद्धार्थ वर्मा, अजीत कुमार, समीर जैन और विक्रम डी. चौहान ने इस पहल की सराहना की। न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने सुवास सेल के काम की प्रशंसा करते हुए टीम को बधाई दी।

सुप्रीम कोर्ट के 9,161 फैसलों का भी हिंदी अनुवाद

हिंदी में फैसले उपलब्ध कराने का काम केवल इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णयों तक सीमित नहीं है। सुवास प्रकोष्ठ ने अब तक सुप्रीम कोर्ट के 9,161 फैसलों का हिंदी अनुवाद पूरा करके शीर्ष अदालत को भेजा है। इसके अलावा अनुवाद का काम तय श्रेणियों के अनुसार जारी है। इसमें एएफआर यानी रिपोर्ट किए जाने योग्य फैसले, तीन पेज से अधिक के अंतिम गैर-एएफआर आदेश और उत्तर प्रदेश से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसले शामिल हैं। बॉम्बे और आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हिंदी अनुवाद भी इस प्रक्रिया का हिस्सा है। इस काम का उद्देश्य कानूनी जानकारी को अधिक लोगों तक पहुंचाना है। अंग्रेजी में उपलब्ध फैसलों का हिंदी रूप मिलने से उन लोगों को मदद मिल सकती है, जो कानूनी प्रक्रिया को समझना चाहते हैं, लेकिन भाषा की वजह से मुश्किल महसूस करते हैं।

चौरी-चौरा से केशव सिंह केस तक, ऐतिहासिक फैसले भी हिंदी में

इलाहाबाद हाई कोर्ट केवल फैसलों का अनुवाद ही नहीं कर रहा, बल्कि कानूनी इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों को भी हिंदी में लोगों तक पहुंचा रहा है। इसके लिए कोर्ट की ओर से दो ई-पत्रिकाएं प्रकाशित की जा रही हैं। 26 नवंबर 2024 को संविधान दिवस के अवसर पर शुरू की गई ‘न्यायभा-न्याय की किरण’ के सात अंक प्रकाशित हो चुके हैं। वहीं, फरवरी 2024 में शुरू हुई ऐतिहासिक निर्णय ई-पुस्तिका के छह अंक जारी किए जा चुके हैं। इन प्रकाशनों में चौरी-चौरा केस, केशव सिंह केस और राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी जैसे चर्चित ऐतिहासिक मामलों के फैसलों के हिंदी अनुवाद शामिल हैं। ये सामग्री हाई कोर्ट की वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध है। इससे कानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों, शोधकर्ताओं, वकीलों और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों को महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों को समझने का अवसर मिलता है।

आम लोगों के लिए क्यों अहम है यह पहल?

अदालतों के फैसले अक्सर कानूनी शब्दावली और अंग्रेजी भाषा में लिखे जाते हैं। ऐसे में आम लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि किसी मामले में अदालत ने क्या कहा और उसके फैसले का क्या महत्व है। हिंदी अनुवाद इस दूरी को कम करने में मदद कर सकता है। हालांकि, किसी फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ते समय उसके मूल आदेश और आधिकारिक कानूनी स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। खासकर कानूनी विवाद या मुकदमे से जुड़े मामलों में जरूरत पड़ने पर वकील की सलाह लेना उचित है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की यह उपलब्धि न्यायिक जानकारी को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। एक लाख फैसलों का हिंदी अनुवाद पूरा होना बताता है कि तकनीक और संस्थागत प्रयासों के जरिए न्याय से जुड़ी जानकारी को आम लोगों की भाषा में पहुंचाया जा सकता है।

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