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February 24, 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: धर्मांतरण कानून से नहीं रुकती लिव-इन रिलेशनशिप

The CSR Journal Magazine
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में धर्मांतरण निषेध कानून के तथ्यों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश का 2021 का धर्मांतरण निषेध कानून न तो दूसरे धर्म में शादी करने पर रोक लगाता है और न ही लिव-इन रिलेशनशिप में रहने से। यह फैसला तब आया जब कोर्ट ने 12 याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें विभिन्न धर्मों के बीच रिश्तों की बात की गई।

पुलिस सुरक्षा के लिए याचिका

इन याचिकाओं के तहत कुछ मुस्लिम महिलाएं हिंदू पुरुषों के साथ रह रही थीं, जबकि कुछ हिंदू महिलाएं मुस्लिम पुरुषों के साथ। इन जोड़ों ने सुरक्षा हेतु कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि उन्हें लगातार धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। न्यायालय ने इन याचिकाओं को गंभीरता से लिया और जोड़ों को राहत देने का आदेश दिया।

संविधान के अधिकारों की रक्षा

जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि कोर्ट इन जोड़ों को केवल हिंदू और मुस्लिम के रूप में नहीं देखता, बल्कि इन्हें बालिग व्यक्तियों के रूप में माना जाता है जो अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अहम हिस्सा है।

धर्म का आधार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

कोर्ट ने आगे обозначाया कि अगर एक ही धर्म के लोग लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं, तो अलग-अलग धर्मों के लोग भी ऐसा कर सकते हैं। यह सिद्धांत संविधान की धारा 14 और 15 के अंतर्गत भी आता है, जो सभी के लिए समानता की बात करता है।

धर्मांतरण विरोधी कानून की व्याख्या

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत, किसी भी व्यक्ति को अपने धर्म को बदलने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। अगर कोई व्यक्ति वास्तव में अपना धर्म बदलना चाहता है, तो उसे एक्ट की निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना होगा। लेकिन शादी या लिव-इन रिलेशनशिप के लिए धर्म परिवर्तन आवश्यक नहीं है।

नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण

कोर्ट ने यह भी कहा कि अंतरधार्मिक संबंधों के चलते किसी को भी अपने बुनियादी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। जाति, पंथ, लिंग या धर्म के आधार पर भेदभाव न करने का संवैधानिक प्रावधान है। इसलिए, अगर एक ही धर्म के लोग एकसाथ रह सकते हैं, तो अलग-अलग धर्मों के लोग भी ऐसा करने से वंचित नहीं हो सकते।

अंत में

इस फैसले के साथ, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक स्पष्ट संदेश दिया है कि व्यक्तिगत संबंधों में दखल देना और भेदभाव करना कानूनी और नैतिक रूप से गलत है। धर्मांतरण कानून के तहत, विभिन्न धर्मों के सह-अस्तित्व का अधिकार मजबूत किया गया है और यह साबित हुआ है कि प्यार और रिश्ते किसी भी धार्मिक बंधन से परे हैं।

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