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January 8, 2026

अब AIIMS भोपाल में पोस्टमार्टम बिना चीर-फाड़, सिर्फ 30 मिनट में पता चलेगी मौत का राज

The CSR Journal Magazine
भोपाल जल्द ही देश के उन चुनिंदा शहरों में शामिल होने जा रहा है, जहां शव का पोस्टमार्टम करने के लिए डॉक्टरों को कैंची या सर्जिकल नश्तर का इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा। एम्स भोपाल में वर्चुअल ऑटोप्सी की सुविधा शुरू होने जा रही है, जो शरीर के आंतरिक अंगों की जांच डिजिटल तकनीक से करेगी। यह प्रक्रिया पूरी तरह से नॉन-इनवेसिव यानी बिना किसी चीर-फाड़ के होगी और इसे मात्र 30 मिनट में पूरा किया जा सकेगा।

सरकार ने दी हरी झंडी, एम्स भोपाल पहला केंद्र बनेगा

एम्स प्रबंधन ने केंद्रीय वित्त मंत्रालय की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी (SFC) के समक्ष इस परियोजना का औपचारिक प्रस्ताव रखा है। भोपाल सांसद आलोक शर्मा ने बताया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से पहले ही सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है। अब वित्त मंत्रालय से फंड जारी होते ही एम्स भोपाल यह सुविधा देने वाला मध्य प्रदेश का पहला अस्पताल बन जाएगा।

वर्चुअल पोस्टमार्टम: जापान और पश्चिमी देशों की तकनीक

वर्चुअल ऑटोप्सी तकनीक जापान और अन्य विकसित देशों में लंबे समय से इस्तेमाल की जा रही है। इसमें शव की जांच के लिए सीटी स्कैन (CT Scan) और एमआरआई जैसी डिजिटल मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे डॉक्टर शरीर के अंदरूनी हिस्सों को बारीकी से देख सकते हैं और मौत के कारण का पता लगा सकते हैं। भारत में इसकी शुरुआत सबसे पहले 2021 में एम्स दिल्ली में हुई थी।

3D डिजिटल तस्वीरों में कैद होंगे मौत के सबूत

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्चुअल ऑटोप्सी की रिपोर्ट कोर्ट में डिजिटल साक्ष्य के रूप में महत्वपूर्ण साबित होगी। उदाहरण के लिए, यदि मौत हार्ट ब्लॉकेज या नस फटने से हुई है, तो मशीन तीन-लेयर वाली थ्रीडी तस्वीर तैयार करेगी। इसमें पूरे शरीर की स्थिति, संबंधित अंग और उस नस का क्लोज़-अप शामिल होगा। इन डिजिटल साक्ष्यों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जो पारंपरिक पोस्टमार्टम में संभव नहीं होता।

परिजनों को मिलेगी भावनात्मक राहत

धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण कई बार परिवार शव की चीर-फाड़ नहीं कराना चाहते। पारंपरिक पोस्टमार्टम के दौरान इस बात को लेकर विवाद भी होते हैं। वर्चुअल ऑटोप्सी में शव पूरी तरह सुरक्षित रहता है, जिससे परिवार को भावनात्मक और धार्मिक संतुष्टि मिलती है। शव को बिना नुकसान पहुँचाए परिजनों को सौंपा जा सकता है।

प्रक्रिया होगी केवल 30 मिनट में

पारंपरिक पोस्टमार्टम में कई घंटे लग जाते हैं, जबकि वर्चुअल ऑटोप्सी केवल 30 मिनट में पूरी हो सकती है। यह तकनीक सड़क हादसों, हत्या, और संक्रामक रोगों जैसे कोविड-19 से हुई मौतों की त्वरित जांच में बेहद उपयोगी साबित होगी। इसके अलावा, डॉक्टरों और अस्पताल स्टाफ को संक्रमण के खतरे से भी बचाया जा सकेगा।

देशभर में 38 वर्चुअल ऑटोप्सी लैब का लक्ष्य

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की योजना के अनुसार, 2026 की शुरुआत तक पूरे देश में 38 वर्चुअल ऑटोप्सी लैब स्थापित की जाएंगी। इसमें एम्स भोपाल एक प्रमुख केंद्र के रूप में काम करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक से पोस्टमार्टम प्रक्रिया अधिक वैज्ञानिक, तेज और पारदर्शी होगी।
एम्स भोपाल में वर्चुअल ऑटोप्सी की शुरुआत न केवल पोस्टमार्टम की प्रक्रिया को आधुनिक और तेज बनाएगी, बल्कि परिजनों को भावनात्मक राहत भी देगी और कोर्ट में डिजिटल साक्ष्यों के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इस तकनीक के आने से मध्य प्रदेश में पोस्टमार्टम प्रक्रिया एक नई दिशा में कदम रखेगी।
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