देश की कोचिंग राजधानी कोटा में AI ने पढ़ाई का तरीका बदलना शुरू कर दिया है। एक निजी कोचिंग संस्थान द्वारा विकसित ‘मिरेकल मशीन’ छात्रों की पढ़ाई को पूरी तरह व्यक्तिगत बना रही है। यह मशीन हर छात्र की क्षमता, कमजोरी और गति के अनुसार अलग होमवर्क और प्रश्नपत्र तैयार करती है, जिससे NEET और JEE जैसी कठिन परीक्षाओं की तैयारी अधिक प्रभावी हो रही है।
क्या है ‘मिरेकल मशीन’ और क्यों है खास
कोटा में मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों छात्रों के लिए पढ़ाई अक्सर एक जैसे पैटर्न में होती रही है। लेकिन ‘मिरेकल मशीन’ इस व्यवस्था को तोड़ती है। यह एक AI आधारित सिस्टम है, जिसे कोचिंग संस्थान ने खुद विकसित किया है और जिस पर उसका पेटेंट भी है।
संस्थान के अनुसार, यह मशीन उनके 90 से अधिक केंद्रों पर लगाई गई है और कुल मिलाकर 150 से ज्यादा मशीनें देशभर में काम कर रही हैं। मशीन में संस्थान का खुद का सॉफ्टवेयर ‘यूनिडेक्स’ चलता है, जिससे छात्र, शिक्षक, अभिभावक और प्रबंधन एक ही प्लेटफॉर्म पर जुड़े रहते हैं। हर छात्र का एक अलग डिजिटल प्रोफाइल बनाया जाता है, जिसमें उसकी पूरी शैक्षणिक जानकारी दर्ज होती है। यही डेटा मशीन के काम करने की नींव बनता है।

टेस्ट के बाद शुरू होता है AI का विश्लेषण
क्लासरूम में पढ़ाई के बाद टेस्ट इस सिस्टम का सबसे अहम हिस्सा है। जैसे ही छात्र टेस्ट देता है, AI सिस्टम सक्रिय हो जाता है। यह केवल सही या गलत जवाब नहीं देखता, बल्कि यह भी जांचता है कि छात्र ने किस सवाल पर कितना समय लगाया, कौन सा टॉपिक उसे कठिन लगा और किन जगहों पर बार-बार गलतियां हो रही हैं।
यह विश्लेषण विषय स्तर से आगे बढ़कर टॉपिक और सब-टॉपिक तक किया जाता है। उदाहरण के लिए, फिजिक्स में यदि किसी छात्र को ‘रोटेशन’ या ‘ऑप्टिक्स’ में दिक्कत है, तो मशीन उसे पहचान लेती है। इसी डेटा के आधार पर आगे का होमवर्क और अभ्यास सामग्री खुद-ब-खुद तैयार हो जाती है।

हर छात्र के लिए अलग प्रश्नपत्र और होमवर्क
इस AI सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां किसी दो छात्रों का प्रश्नपत्र एक जैसा नहीं होता। ऑफलाइन परीक्षाओं में जहां पूरी क्लास एक ही पेपर हल करती है, वहीं ‘मिरेकल मशीन’ हर छात्र की ताकत और कमजोरी के अनुसार अलग पेपर देती है।
अगर दो छात्र एक ही बैच में पढ़ रहे हैं, फिर भी उनकी तैयारी का स्तर अलग होने के कारण उनके सवालों का स्तर और फोकस अलग होगा। कमजोर टॉपिक्स से जुड़े सवाल ज्यादा मिलते हैं, जबकि मजबूत हिस्सों में धीरे-धीरे कठिन सवाल दिए जाते हैं। इससे छात्र बेवजह के दबाव में आए बिना अपनी कमजोरियों पर काम कर पाते हैं।


