संविधान के तहत केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत किए गए बजट सत्र के दौरान गुरुवार, 5 फरवरी को राज्यसभा में महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान सदन का माहौल उस समय गरमा गया जब केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बीच तीखी बहस हुई। सत्र के दौरान जेपी नड्डा ने कांग्रेस को संबोधित करते हुए कुछ तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया, जिससे विपक्षीय सदस्यों में असंतोष देखा गया। उन्होंने कहा कि “कांग्रेस को ‘अबोध बालक’ का बंधक नहीं बनाना चाहिए।” इस बयान के तुरंत बाद विपक्षी सांसदों ने जोरदार विरोध जताया।
बिना नाम लिए की गई टिप्पणी पर विपक्ष ने जताया विरोध
जेपी नड्डा ने अपने संबोधन में किसी नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान को कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जोड़कर देखा गया। एनडीए सांसदों की ओर से संसद में बार-बार राहुल गांधी की विदेश यात्राओं और उनके बयानों को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। ऐसे में इस टिप्पणी को भी उसी संदर्भ में लिया गया। विपक्ष के सदस्य इस टिप्पणी के बाद अपनी सीटों से खड़े हो गए और अध्यक्ष से आपत्ति जताने लगे। कई सांसदों ने इसे असंसदीय बताया और जेपी नड्डा से बयान वापस लेने की मांग की। हालांकि, जेपी नड्डा ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी की भावनाएं आहत करने का नहीं था, बल्कि उन्होंने केवल कांग्रेस पार्टी की स्थिति पर टिप्पणी की थी।
खड़गे ने दिया करारा जवाब
कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे ने जेपी नड्डा की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि विपक्ष को दबाने की कोशिश हो रही है और इस तरह की भाषा लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है। खड़गे ने यह भी कहा कि संसद में हर दल को समान अधिकार है और इस प्रकार की बयानबाजी से सदन को कोई लाभ नहीं होगा। खड़गे ने यह मुद्दा सदन के सामने मजबूती से उठाया और स्पष्ट किया कि कांग्रेस कोई ऐसी पार्टी नहीं है जिसे किसी एक व्यक्ति के माध्यम से आँका जाए। उनके इस बयान का विपक्षी सांसदों ने समर्थन किया।
अध्यक्ष ने दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की
राज्यसभा में उत्पन्न हुई स्थिति को देखते हुए सदन के सभापति ने दोनों पक्षों से अपील की कि संसद की गरिमा बनाए रखें और चर्चा को मुद्दों पर केंद्रित रखें। उन्होंने कहा कि सभी सांसदों को एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए आपसी संवाद को मर्यादित रखना चाहिए। घटना के बाद सदन की कार्यवाही कुछ समय के लिए बाधित रही, लेकिन बाद में अन्य विधायी कार्यों के साथ चर्चा दोबारा शुरू हुई।
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