भारत में बच्चों के लापता होने के मामले लगातार चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ‘मिसिंग चिल्ड्रन’ रिपोर्ट के अनुसार 1 जनवरी 2025 से 31 जनवरी 2026 के बीच देशभर में कुल 33,577 बच्चे लापता दर्ज किए गए। हालांकि प्रशासन और पुलिस की कोशिशों से इनमें से बड़ी संख्या में बच्चों को खोज लिया गया, लेकिन 7,777 बच्चों का अब तक कोई सुराग नहीं मिला है। यह आंकड़ा देश में बाल सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
छत्तीसगढ़ में 400 बच्चे अब भी लापता
रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ में भी बच्चों के गायब होने के मामलों ने चिंता बढ़ा दी है। इस अवधि के दौरान राज्य से 982 बच्चे लापता हुए। पुलिस और प्रशासन ने इनमें से 582 बच्चों को बरामद कर लिया, लेकिन 400 बच्चे अब भी लापता हैं और उनका कोई ठोस सुराग नहीं मिल पाया है। लापता बच्चों के मामलों में छत्तीसगढ़ देशभर में छठे स्थान पर है।
14 से 17 साल के किशोर सबसे ज्यादा प्रभावित
आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि लापता होने वाले बच्चों में 14 से 17 साल की उम्र के किशोरों की संख्या अधिक है। खास बात यह है कि इस आयु वर्ग में लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा पाई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानव तस्करी, बाल श्रम, घर से भागने जैसी कई वजहें इन मामलों के पीछे हो सकती हैं।
पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा मामले
देश में बच्चों के लापता होने के मामलों में पश्चिम बंगाल पहले स्थान पर है। यहां इस अवधि में 19,145 बच्चे लापता हुए। इनमें से 15,465 बच्चों को खोज लिया गया, लेकिन 3,680 बच्चे अब भी गायब हैं। इसके बाद मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर है, जहां 4,256 बच्चे लापता हुए। इनमें से 1,059 बच्चों का अभी तक पता नहीं चल पाया है।
कुछ राज्यों में दर्ज नहीं हुआ एक भी मामला
रिपोर्ट के अनुसार देश के कुछ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में इस अवधि के दौरान बच्चों के लापता होने की कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई। इनमें नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गुजरात, लक्षद्वीप और दादर एवं नगर हवेली शामिल हैं।
बढ़ती घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के गायब होने के मामलों में वृद्धि सामाजिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चिंता पैदा करती है। बच्चों की सुरक्षा के लिए निगरानी तंत्र मजबूत करने, जागरूकता बढ़ाने और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।
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