World Puppetry Day पर चिंतन ‘पहचान बचाने की जंग’ लड़ रही राजस्थान की कठपुतली कला

The CSR Journal Magazine
Rajasthan की पारंपरिक कठपुतली कला आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। कभी लोकजीवन और पर्यटन का प्रमुख आकर्षण रही यह कला अब डिजिटल युग में पीछे छूटती जा रही है। कलाकार आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं और नई पीढ़ी इस पेशे से दूरी बना रही है।

सुनहरे अतीत से संघर्ष भरे वर्तमान तक

Jaipur सहित पूरे राजस्थान में कठपुतली कला कभी गलियों, मेलों और राजदरबारों की शान हुआ करती थी। रंग-बिरंगी कठपुतलियों के जरिए लोककथाएं, इतिहास और सामाजिक संदेश लोगों तक पहुंचाए जाते थे। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक थी।
लेकिन समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ती गई। आज वही कलाकार दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं और इस कला का अस्तित्व खतरे में है।

डिजिटल युग ने छीनी पारंपरिक मंच की चमक

मोबाइल, इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते प्रभाव ने लोक कलाओं को हाशिए पर ला दिया है। पहले जहां शादियों, त्योहारों और पर्यटन स्थलों पर कठपुतली शो नियमित होते थे, अब ऐसे मौके बेहद कम हो गए हैं।
कलाकारों का कहना है कि आज की युवा पीढ़ी डिजिटल मनोरंजन की ओर ज्यादा आकर्षित है, जिससे कठपुतली जैसे पारंपरिक माध्यमों की मांग तेजी से घटी है। इसका सीधा असर उनकी आय और जीवन स्तर पर पड़ा है।

आर्थिक संकट से जूझते कलाकार

कठपुतली कलाकारों के सामने सबसे बड़ी समस्या स्थायी आय का अभाव है। बढ़ती महंगाई और घटते काम के कारण कई परिवारों ने यह पेशा छोड़कर मजदूरी या अन्य रोजगार अपना लिया है।
कलाकारों का दर्द यह भी है कि उन्हें सरकारी योजनाओं का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता। ऐसे में वे अपने बच्चों को इस क्षेत्र में लाने से भी हिचक रहे हैं, जिससे यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर पहुंच रही है।

संरक्षण और थिएटर की मांग

कलाकारों की सबसे बड़ी मांग है कि जयपुर में एक समर्पित कठपुतली थिएटर बनाया जाए, जहां नियमित कार्यक्रम आयोजित हों। उनका मानना है कि इससे न केवल उन्हें स्थायी रोजगार मिलेगा, बल्कि देश-विदेश के पर्यटकों को भी आकर्षित किया जा सकेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार, पर्यटन विभाग और सांस्कृतिक संस्थाएं मिलकर इस दिशा में काम करें, तो कठपुतली कला को नया जीवन मिल सकता है।

परंपरा के साथ आधुनिकता का संगम

कुछ कलाकार अब समय के साथ बदलते हुए सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का सहारा ले रहे हैं। यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर कठपुतली शो प्रस्तुत कर वे वैश्विक दर्शकों तक पहुंच बना रहे हैं।
इसके साथ ही, कठपुतली के जरिए शिक्षा, स्वच्छता, पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण जैसे विषयों पर जागरूकता भी फैलाई जा रही है। यह प्रयास इस कला को आधुनिक संदर्भों में प्रासंगिक बनाए रखने की दिशा में अहम साबित हो सकता है।
World Puppetry Day सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि चेतावनी भी है कि यदि समय रहते इस कला को संरक्षण और मंच नहीं मिला, तो राजस्थान की यह अनमोल विरासत इतिहास बन सकती है। जरूरत है ठोस पहल की, ताकि कठपुतली की डोर आने वाली पीढ़ियों तक मजबूती से बंधी रहे।

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