app-store-logo
play-store-logo
January 9, 2026

वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई पर भारत की चुप्पी क्यों? गुटनिरपेक्ष नीति, रणनीतिक हित और कूटनीतिक संतुलन

The CSR Journal Magazine
वेनेज़ुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ़्तारी को लेकर अमेरिका की कार्रवाई ने वैश्विक राजनीति को दो ध्रुवों में बाँट दिया है। जहां मलेशिया और दक्षिण अफ़्रीका जैसे देशों ने खुलकर इसका विरोध किया, वहीं भारत ने संतुलित और तटस्थ रुख़ अपनाया। सवाल यह है कि ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने का दावा करने वाला भारत इस मुद्दे पर मुखर क्यों नहीं हुआ?

भारत का आधिकारिक रुख़ चिंता, लेकिन निंदा नहीं

वेनेज़ुएला में अमेरिकी कार्रवाई के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर हालात पर “गहरी चिंता” जताई, लेकिन अमेरिका की निंदा करने से परहेज़ किया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी यही कहा कि सभी पक्षों को वेनेज़ुएला के लोगों की सुरक्षा और भलाई को प्राथमिकता देनी चाहिए।
भारत का यह रुख़ किसी एक पक्ष के समर्थन या विरोध से ज़्यादा मानवीय चिंता और संवाद पर ज़ोर देता है। यह वही भाषा है, जिसे भारत पहले भी यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व के कई संघर्षों में अपनाता रहा है।

खुलकर विरोध क्यों नहीं करता भारत?

रणनीतिक मामलों के जानकार हैपीमोन जैकब के मुताबिक़, भारत की यह चुप्पी नई नहीं है। भारत अक्सर बड़ी शक्तियों की कार्रवाइयों पर सार्वजनिक निंदा से बचता है, ख़ासकर तब जब वे देश भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीति के अहम साझेदार हों।
अमेरिका और रूस—दोनों ही भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में भारत किसी एक की खुली आलोचना कर दूसरे के पक्ष में खड़ा नहीं होना चाहता। इसके अलावा भारत “मेगाफ़ोन डिप्लोमेसी” के बजाय बंद दरवाज़ों के पीछे संवाद को ज़्यादा प्रभावी मानता है।

मलेशिया और दक्षिण अफ़्रीका से तुलना क्यों हो रही है?

मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम और दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने अमेरिकी कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन बताया। उनके बयानों की भारत में भी काफ़ी चर्चा हुई और सवाल उठे कि भारत ने वैसी सख़्त प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी।
विश्लेषकों का मानना है कि हर देश अपनी विदेश नीति अपने भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों के अनुसार तय करता है। दक्षिण एशियाई देश, ख़ासतौर पर भारत, अमेरिका के साथ व्यापार, टेक्नोलॉजी और सुरक्षा सहयोग को ध्यान में रखते हुए अत्यधिक संतुलित भाषा चुनते हैं।

गुटनिरपेक्षता भारत की पुरानी नीति

भारत की तटस्थता की जड़ें उसकी गुटनिरपेक्ष नीति में हैं, जिसकी नींव जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी। नेहरू का मानना था कि निंदा से ज़्यादा ज़रूरी है संवाद और समाधान। यही कारण है कि 1956 के हंगरी संकट से लेकर 2003 के इराक़ युद्ध और 2022 के यूक्रेन युद्ध तक, भारत ने अक्सर सार्वजनिक निंदा से दूरी बनाए रखी।
यह नीति भारत को उन स्थितियों में लचीलापन देती है, जहां उसके साझेदार आपस में टकराव में हों। वेनेज़ुएला के मामले में भी भारत उसी ऐतिहासिक निरंतरता का पालन करता दिख रहा है।
भारत का वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई के ख़िलाफ़ खुलकर न बोलना, न तो समर्थन है और न ही मौन स्वीकृति। यह उसकी दीर्घकालिक गुटनिरपेक्ष नीति, रणनीतिक हितों और कूटनीतिक संतुलन का हिस्सा है।
भारत का ज़ोर हमेशा संवाद, संयम और मानवीय सरोकारों पर रहा है और मौजूदा संकट में भी वही रुख़ दिखाई देता है।

Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

App Store –  https://apps.apple.com/in/app/newspin/id6746449540

Google Play Store – https://play.google.com/store/apps/details?id=com.inventifweb.newspin&pcampaignid=web_share

Latest News

Popular Videos