वेनेज़ुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ़्तारी को लेकर अमेरिका की कार्रवाई ने वैश्विक राजनीति को दो ध्रुवों में बाँट दिया है। जहां मलेशिया और दक्षिण अफ़्रीका जैसे देशों ने खुलकर इसका विरोध किया, वहीं भारत ने संतुलित और तटस्थ रुख़ अपनाया। सवाल यह है कि ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने का दावा करने वाला भारत इस मुद्दे पर मुखर क्यों नहीं हुआ?
भारत का आधिकारिक रुख़ चिंता, लेकिन निंदा नहीं
वेनेज़ुएला में अमेरिकी कार्रवाई के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर हालात पर “गहरी चिंता” जताई, लेकिन अमेरिका की निंदा करने से परहेज़ किया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी यही कहा कि सभी पक्षों को वेनेज़ुएला के लोगों की सुरक्षा और भलाई को प्राथमिकता देनी चाहिए।
भारत का यह रुख़ किसी एक पक्ष के समर्थन या विरोध से ज़्यादा मानवीय चिंता और संवाद पर ज़ोर देता है। यह वही भाषा है, जिसे भारत पहले भी यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व के कई संघर्षों में अपनाता रहा है।

खुलकर विरोध क्यों नहीं करता भारत?
रणनीतिक मामलों के जानकार हैपीमोन जैकब के मुताबिक़, भारत की यह चुप्पी नई नहीं है। भारत अक्सर बड़ी शक्तियों की कार्रवाइयों पर सार्वजनिक निंदा से बचता है, ख़ासकर तब जब वे देश भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीति के अहम साझेदार हों।
अमेरिका और रूस—दोनों ही भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में भारत किसी एक की खुली आलोचना कर दूसरे के पक्ष में खड़ा नहीं होना चाहता। इसके अलावा भारत “मेगाफ़ोन डिप्लोमेसी” के बजाय बंद दरवाज़ों के पीछे संवाद को ज़्यादा प्रभावी मानता है।

मलेशिया और दक्षिण अफ़्रीका से तुलना क्यों हो रही है?
मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम और दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने अमेरिकी कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन बताया। उनके बयानों की भारत में भी काफ़ी चर्चा हुई और सवाल उठे कि भारत ने वैसी सख़्त प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी।
विश्लेषकों का मानना है कि हर देश अपनी विदेश नीति अपने भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों के अनुसार तय करता है। दक्षिण एशियाई देश, ख़ासतौर पर भारत, अमेरिका के साथ व्यापार, टेक्नोलॉजी और सुरक्षा सहयोग को ध्यान में रखते हुए अत्यधिक संतुलित भाषा चुनते हैं।


