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February 10, 2026

बांग्लादेश की राजनीति में जमात-ए-इस्लामी का उभार देश, महिलाएँ और अल्पसंख्यकों पर क्या है पार्टी का नज़रिया?

The CSR Journal Magazine
12 फ़रवरी को होने वाले संसदीय चुनावों से पहले बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी एक बार फिर सियासी केंद्र में है। लंबे समय तक प्रतिबंध झेलने के बाद पार्टी न केवल मज़बूत संगठन के साथ मैदान में लौटी है, बल्कि देश के चरित्र, महिलाओं की भूमिका और अल्पसंख्यकों को लेकर उसके विचारों पर बहस भी तेज़ हो गई है। भारत समेत पड़ोसी देशों की नज़रें भी इस उभार पर टिकी हैं।

सत्ता से हाशिए तक और फिर वापसी जमात की सियासी यात्रा

बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी देश की सबसे पुरानी इस्लामी राजनीतिक पार्टियों में से एक है। वर्षों तक अवामी लीग और बीएनपी के बीच सीधी लड़ाई रही, जिसमें जमात अक्सर हाशिए पर या सहयोगी की भूमिका में दिखी। 2013 में शेख़ हसीना सरकार के दौरान पार्टी पर चुनाव लड़ने की पाबंदी लगाई गई, जिससे वह एक दशक से अधिक समय तक औपचारिक राजनीति से बाहर रही।
अगस्त 2024 में अवामी लीग सरकार के पतन और उस पर प्रतिबंध के बाद राजनीतिक परिदृश्य बदला। विश्लेषकों के अनुसार, बीएनपी के सामने अब सबसे संगठित चुनौती जमात-ए-इस्लामी की है। खासकर दक्षिण-पश्चिम बांग्लादेश के शातखीरा जैसे इलाकों में पार्टी का आधार मज़बूत माना जाता है।

इस्लामी मूल्यों पर देश जमात की वैचारिक दिशा

शातखीरा-4 सीट से जमात उम्मीदवार और पूर्व सांसद ग़ाज़ी नज़रुल इस्लाम के अनुसार, पार्टी चाहती है कि बांग्लादेश “इस्लामी मूल्यों” के आधार पर चले। उनका कहना है कि देश की लगभग 90 प्रतिशत आबादी मुसलमान है और इस्लामी सिद्धांत अपनाने से समाज में शांति और नैतिकता आएगी। वे विदेशी दख़ल के विरोध और राष्ट्रीय संप्रभुता पर ज़ोर देते हैं। हालांकि आलोचकों का कहना है कि इस वैचारिक रुख़ के पीछे अल्पसंख्यकों और उदार मूल्यों को लेकर चिंताएँ छिपी हैं। नज़रुल इस्लाम अल्पसंख्यक शब्द को ही नकारते हुए कहते हैं कि “हमारे देश में कोई अल्पसंख्यक नहीं है”, लेकिन यह बयान खुद नई बहस को जन्म देता है।

महिलाएँ और सार्वजनिक जीवन पर्दा, महरम और सीमाएँ

महिलाओं को लेकर जमात का नज़रिया सबसे अधिक विवादित है। इस चुनाव में पार्टी ने एक भी महिला उम्मीदवार नहीं उतारी। नज़रुल इस्लाम का कहना है कि जमात महिलाओं के काम करने के ख़िलाफ़ नहीं है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उनके आचरण के लिए “इस्लामी मर्यादाओं” का पालन ज़रूरी मानती है। पार्टी के अनुसार महिलाओं को सादा कपड़े पहनने चाहिए, पर्दा करना चाहिए और घर से बाहर निकलते समय ‘महरम’ यानी निकट पुरुष रिश्तेदार के साथ होना बेहतर है। यह नियम, उनके मुताबिक, सिर्फ़ मुसलमानों पर ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों की महिलाओं पर भी लागू होना चाहिए। जमात की महिला कार्यकर्ताओं का एक वर्ग इस सोच से सहमत दिखता है। उनका कहना है कि पर्दा सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा है। वहीं आलोचक इसे महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित करने की सोच मानते हैं।

रणनीति में नरमी या दोहरी भाषा?

बीएनपी और अन्य आलोचकों का आरोप है कि जमात अपनी छवि बदलने की कोशिश कर रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पार्टी के शीर्ष नेता कहते हैं कि वे शरीयत कानून लागू नहीं करेंगे, जबकि ग्रामीण इलाकों में इस्लामी शासन की बात की जाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, युवा मतदाताओं खासकर ‘जेन ज़ी’ में कट्टर धार्मिक शासन को लेकर उत्साह कम है। इसे देखते हुए जमात शहरी और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए नरम भाषा अपनाती है, जबकि परंपरागत समर्थकों को संतुष्ट करने के लिए धार्मिक एजेंडा बनाए रखती है।

1971 की विरासत, छात्र राजनीति और भारत की चिंता

जमात पर 1971 के मुक्ति आंदोलन का विरोध करने का पुराना आरोप रहा है। आज के कई युवा मतदाता उस दौर से भावनात्मक रूप से जुड़े नहीं हैं, जिससे पार्टी को नया अवसर मिला है। विश्वविद्यालयों में ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ की बढ़ती मौजूदगी और चुनावी जीत ने जमात के विचारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाया है।
हालाँकि ढाका और अन्य शहरों में राय बंटी हुई है। कुछ लोग जमात को वैकल्पिक राजनीतिक ताक़त मानते हैं, तो कई उदारवादी वर्गों को डर है कि इसके सत्ता में आने से सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आज़ादी सिमट सकती है।
भारत के लिए चिंता का कारण अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और सीमा से लगे इलाक़ों में बढ़ती असहिष्णुता है।
हाल की हिंसा और मीडिया संस्थानों पर हमलों की ख़बरों ने इन आशंकाओं को और गहरा किया है।
जमात-ए-इस्लामी का उभार बांग्लादेश की राजनीति को एक नए मोड़ पर ले आया है। यह पार्टी अनुशासन, संगठन और धार्मिक पहचान के सहारे समर्थन जुटा रही है, लेकिन उसके विचार खासकर महिलाओं, अल्पसंख्यकों और उदार मूल्यों को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े करते हैं। आने वाले चुनाव तय करेंगे कि बांग्लादेश किस दिशा में आगे बढ़ता है: धार्मिक पहचान की ओर या बहुलतावादी लोकतांत्रिक रास्ते पर।

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