क्या वंदे मातरम् को मिलेगा राष्ट्रगान का दर्जा? सुप्रीम कोर्ट ने मांगा केंद्र से जवाब

The CSR Journal Magazine

‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने और सभी छह अंतरे अनिवार्य करने के कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; केंद्र सरकार से मांगा जवाब

भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बराबर आधिकारिक दर्जा देने और इसके सभी छह अंतरों (Stanzas) को अनिवार्य बनाने से जुड़े सरकारी आदेशों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान का समान दर्जा देने की मांग करने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से औपचारिक जवाब मांगा है। इसके साथ ही अदालत ने गृह मंत्रालय के उन हालिया विवादित सर्कुलरों और कानूनी संशोधनों को चुनौती देने वाली नई याचिकाओं पर भी नोटिस जारी किया है, जिनमें सरकारी कार्यक्रमों और शैक्षणिक संस्थानों में इस गीत की सभी छह कड़ियों को गाना अनिवार्य किया गया है।
प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई की। न्यायालय ने सभी संबंधित याचिकाओं को एक साथ जोड़ते हुए केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई के लिए 30 नवंबर 2026 की तारीख तय की है।

ऐतिहासिक संदर्भ और संविधान सभा का प्रस्ताव

सुप्रीम कोर्ट में यह मुख्य याचिका अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई थी, जिसे दिल्ली हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित (Transfer) करने की अपील स्वीकार कर ली गई है। याचिकाकर्ता के वकील अश्वनी दुबे ने अदालत में दलील दी कि देश को एकजुट रखने के लिए राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों को समान बढ़ावा देना सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है। याचिका में 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा दिए गए ऐतिहासिक बयान का हवाला दिया गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा, लेकिन ‘वंदे मातरम्’ जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे भी ‘जन गण मन’ के समान ही सम्मानित किया जाएगा और उसे बराबर का दर्जा प्राप्त होगा। याचिकाकर्ता का कहना है कि जहां ‘जन गण मन’ राज्य व्यवस्था और संप्रभुता को व्यक्त करता है, वहीं ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्र के चरित्र, उसकी मिट्टी और स्वतंत्रता के संघर्षशील इतिहास को बयां करता है। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर वंदे मातरम् को वह आधिकारिक नियम और सुरक्षा प्राप्त नहीं हो सकी जो राष्ट्रगान को मिली हुई है। दिशा-निर्देशों के अभाव में फिल्मों और पार्टियों में इसका गलत तरीके से इस्तेमाल होता है, जिसे रोकने के लिए एक ठोस राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता है।

विवाद की जड़: छह अंतरे और वर्ष 2026 का नया संशोधन

यह पूरा कानूनी विवाद तब और गहरा गया जब केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने वर्ष 2026 में एक नई गाइडलाइन जारी की। इस निर्देश के तहत यह अनिवार्य किया गया कि सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और कॉलेजों में जब भी राष्ट्रीय गीत गाया जाएगा, तो उसके केवल पहले दो छंद नहीं, बल्कि बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखित मूल उपन्यास ‘आनंदमठ’ के सभी छह अंतरे पूरे गाए जाएंगे। इसके तुरंत बाद, ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ में एक संशोधन किया गया, जिसके तहत वंदे मातरम् के गायन को रोकने या उसमें बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल और दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान जोड़ दिया गया। इस सरकारी कदम के खिलाफ मशहूर कर्नाटक संगीत गायक टी.एम. कृष्णा, पूर्व आईएएस अधिकारी बालकृष्णन सत्यभामा मवोजी और फुले-अंबेडकरवादी कार्यकर्ता बी.डी. बोरकर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

धार्मिक संदर्भ का हवाला

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने दलील दी कि मूल रूप से वंदे मातरम् के शुरुआती दो छंद ही देश की मातृभूमि और प्रकृति की सुंदरता की वंदना करते हैं। इतिहास में भी वर्ष 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर कांग्रेस ने केवल पहले दो छंदों को ही स्वीकार किया था, क्योंकि इसके बाद के आखिरी चार छंदों में धार्मिक संदर्भ हैं, जो हिंदू देवी-देवताओं (जैसे दुर्गा और लक्ष्मी) की आराधना से जुड़े हैं। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष भारत में किसी भी नागरिक, विशेषकर अल्पसंख्यकों या विशिष्ट धार्मिक आस्था रखने वाले लोगों को ऐसे छंद गाने के लिए मजबूर करना, जो उनकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत हों, संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने इसे ‘एक धर्म विशेष की प्रार्थना को जबरन थोपने’ जैसा करार दिया।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और पुराना फैसला

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखते हुए केंद्र सरकार को कड़े संकेत दिए। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि “एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार किसी भी नागरिक को उसकी अंतरात्मा या धार्मिक विश्वास के खिलाफ जाकर राष्ट्रीय गीत या उसके सभी छंद गाने के लिए कानूनी तौर पर मजबूर नहीं कर सकती और न ही ऐसा न करने पर किसी के खिलाफ दंडात्मक या आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।” न्यायालय ने इस दौरान वर्ष 1986 के अपने ऐतिहासिक ‘बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य’ मामले के फैसले का हवाला दिया। उस मामले में सर्वोच्च अदालत ने यह व्यवस्था दी थी कि यदि कोई व्यक्ति अपने धार्मिक विश्वासों के कारण राष्ट्रगान गाने से मौन इनकार करता है, लेकिन उसके सम्मान में खड़ा होता है, तो उसे दंडित नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि वही संवैधानिक सिद्धांत और सहिष्णुता इस मामले में भी पूरी तरह लागू होगी। अदालत में जब सरकार के वकील सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील देने की कोशिश की कि इस मामले में औपचारिक नोटिस जारी न किया जाए क्योंकि इससे अनावश्यक सनसनी पैदा हो सकती है, तो पीठ ने उसे खारिज करते हुए कहा कि दंडात्मक कानून और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन की जांच करना अदालत का काम है।

आगे की राह और जनभावनाएं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘वंदे मातरम्’ देश का अत्यंत सम्मानित राष्ट्रीय गीत है और इसके प्रति किसी के मन में कोई संदेह नहीं है, लेकिन विवाद केवल इसकी “अनिवार्यता और दंडात्मक प्रावधानों” को लेकर है। अदालत ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया जो केवल आशंकाओं पर आधारित थीं और साफ किया कि जब तक किसी के साथ भेदभाव या जबरदस्ती नहीं होती, तब तक दखल नहीं दिया जाएगा; लेकिन जहां कानून में सजा का प्रावधान है, वहां न्यायिक समीक्षा अनिवार्य है। अब देश की नजरें 30 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई और केंद्र सरकार द्वारा दाखिल किए जाने वाले जवाब पर टिकी हैं। यह मामला राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों के सम्मान और भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दी गई व्यक्तिगत व धार्मिक स्वतंत्रता के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक संवैधानिक बहस बन गया है।

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