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February 11, 2026

Valentine’s Week Special में प्रेम का महत्व, समर्पण और त्याग दर्शाने वाले, जानें भारतीय प्रेम की खूबसूरती

The CSR Journal Magazine
हर साल 7 फरवरी से 14 फरवरी तक चलने वाला वैलेंटाइन वीक सिर्फ तारीखों का सिलसिला नहीं, बल्कि भावनाओं का उत्सव है। रोज डे से लेकर वैलेंटाइन डे तक, हर दिन प्रेम की अभिव्यक्ति का एक नया रूप लेकर आता है। कपल्स इस सप्ताह का बेसब्री से इंतजार करते हैं और अपने रिश्ते को खास बनाने के लिए छोटे-बड़े प्रयास करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रेम सिर्फ उपहार, रोमांस और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित है, या इसके पीछे कोई गहरी भावनात्मक और सांस्कृतिक जड़ भी है?

पश्चिमी प्रेम बनाम भारतीय प्रेम

पश्चिमी सभ्यता में प्रेम का स्वरूप अधिकतर रोमांटिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित है। फ्रेंच क्रांति के बाद यूरोप में स्वतंत्रता की जो लहर चली, उसी से रोमैंटिसिज्म की अवधारणा जन्मी। प्रेम को सामाजिक बंधनों से मुक्त भावना के रूप में देखा गया। वहीं भारतीय सभ्यता में प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि समर्पण, त्याग और आत्मिक जुड़ाव का नाम है। यहां प्रेम शरीर से नहीं, भाव से शुरू होता है और आत्मा तक पहुंचता है।

संत वैलेंटाइन से शुरू हुई परंपरा

वैलेंटाइन डे की जड़ें संत वैलेंटाइन की कथा से जुड़ी हैं, जिन्होंने राजा के आदेश के विरुद्ध प्रेमी जोड़ों की शादी करवाई थी। इसी साहसिक कदम के कारण उन्हें मृत्यु-दंड दिया गया और उनकी स्मृति में यह दिवस मनाया जाने लगा। पश्चिम में प्रेम को मित्रता, पारिवारिक रिश्तों, आध्यात्मिक भावनाओं और शारीरिक आकर्षण – सभी रूपों में स्वीकार किया गया।

भारतीय दर्शन में प्रेम का मूल तत्व: समर्पण

भारतीय परंपरा में प्रेम का आधार पारस्परिक समर्पण है। जब तक ‘मेरा’ और ‘तेरा’ का भाव बना रहता है, तब तक प्रेम पूर्ण नहीं होता। भक्ति परंपरा में यह भाव ईश्वर के प्रति समर्पण बन जाता है, और मानवीय रिश्तों में यह एक-दूसरे के लिए त्याग और समझ का रूप ले लेता है। यहां प्रेम केवल स्त्री-पुरुष संबंध तक सीमित नहीं, बल्कि माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, गुरु और समाज तक विस्तृत है।

कृष्ण, राधा और द्रौपदी: प्रेम के अलौकिक रूप

कृष्ण और राधा का संबंध प्रेम का वह स्वरूप है, जिसे परिभाषित करना कठिन है। न वह विवाह है, न सामान्य प्रेम संबंध—वह आत्मिक एकत्व है। वहीं कृष्ण और द्रौपदी का रिश्ता सखा-सखी का है, जिसमें संकट के समय द्रौपदी सीधे कृष्ण को पुकारती है। यह दिखाता है कि भारतीय प्रेम में भावनात्मक भरोसा सबसे बड़ा आधार है।

राम और सीता: मर्यादा में बंधा प्रेम

राम-सीता का प्रेम भारतीय संस्कृति का आदर्श रूप है। मर्यादा, संयम और कर्तव्य के बीच भी प्रेम की कोमलता बनी रहती है। राम का सीता के प्रति आकर्षण केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और आत्मिक है। विरह के समय राम का विक्षिप्त होना यह दिखाता है कि प्रेम सिर्फ मिलन नहीं, विरह में भी उतना ही गहरा होता है।

बसंत और मदनोत्सव की परंपरा

भारत में बसंत को मदनोत्सव कहा गया है – यानी प्रेम और काम का उत्सव। स्वयंवर जैसी परंपराएं इस बात का प्रमाण हैं कि प्रेम को सामाजिक मान्यता दी गई थी। यहां प्रेम को कभी पाप नहीं माना गया, बल्कि जीवन की शुद्ध, सुंदर और पवित्र भावना के रूप में स्वीकार किया गया।

जहां प्रेम है, वहीं ईश्वर है

भारतीय सोच के अनुसार प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि एक दर्शन है। जहां प्रेम है, वहीं शांति है, समृद्धि है और वहीं ईश्वर है। प्रेम मनुष्य को ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर ले जाता है। यही प्रेम का असली अर्थ है – समर्पण, एकत्व और आत्मिक जुड़ाव।
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