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March 4, 2026

पहाड़ों पर हल्की बारिश से बढ़ता खतरा, वैज्ञानिकों की नई चेतावनी, साइलेंट डिजास्टर की आशंका

The CSR Journal Magazine
उत्तराखंड की पहाड़ियों में हालिया अध्ययन ने यह साबित किया है कि हल्की लेकिन लगातार बारिश भी बड़ी आपदा का कारण बन सकती है। दून विश्वविद्यालय और अन्य छह प्रतिष्ठित संस्थानों के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 15 से 30 दिनों तक रोजाना औसतन 6 से 7 मिलीमीटर वर्षा के चलते पहाड़ी मलबा अस्थिर हो सकता है। ऐसा मलबा जब लैंडस्लाइड का कारण बनेगा, तब यह जानलेवा बन सकता है।

आपदाओं में बेतहाशा वृद्धि

उत्तराखंड में हर वर्ष लगभग 1900 से अधिक आपदाएं दर्ज की जाती हैं, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 2100 के पार जाने की संभावना है। इस दौरान 263 लोगों की जान भी गई है। यह आंकड़े हमें बताते हैं कि आपदाएं अब सामान्य हों गई हैं और नियमित तौर पर सामने आ रही हैं।

धराली का उदाहरण

धराली में आई आपदा, जो पिछले साल 5 अगस्त को आई थी, इसका एक भयानक उदाहरण है। यह लगातार एक महीने तक हुई बारिश का परिणाम था, जिसने पहाड़ों पर जमा मलबे को पानी से भर दिया था। वैज्ञानिकों के अनुसार, हल्की वर्षा का इसे इतना गंभीर बना दिया कि जब मलबा नीचे आया, तो इसके परिणाम भयानक थे।

धीमी वर्षा का असर

शोध में बताया गया है कि 5 अगस्त को कोई अत्यधिक बारिश नहीं हुई थी। असल में यह पिछले 30 दिनों में हुई 195 मिमी बारिश थी, जिसने मलबा संतृप्त कर दिया। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि बेहतर तरीके से इस मलबे की पहचान और निगरानी की जाए, तो भारी नुकसान से बचा जा सकता है।

मलबे की मैपिंग जरूरी

शोध के निष्कर्षों में सुझाव दिया गया है कि नदी किनारों, ग्लेशियरों और ऊँचाई वाले क्षेत्रों में मलबे की मैपिंग की जानी चाहिए। इससे मलबे के स्रोतों की पहचान और उनकी निगरानी बेहतर होगी। वैज्ञानिकों ने आपदा प्रबंधन नीतियों में नया दृष्टिकोण शामिल करने का भी सुझाव दिया है।

पूर्व चेतावनी तंत्र की आवश्यकता

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर संवेदनशील क्षेत्रों में पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित किया जाए, तो निचले क्षेत्रों की आबादी को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। दून विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभाग के एचओडी डॉ. विपिन कुमार ने कहा कि पहाड़ी नालों में समय के साथ मलबा जमा होता है, जो अत्यधिक खतरे का कारण बन सकता है।

निर्माण में वृद्धि की चिंता

डॉ. विपिन कुमार ने पहाड़ी बसावट के स्वरूप और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण के संबंध में चिंता जताई। उनका कहना है कि ऐसे इलाकों में जहां अधिक संख्या में लोग निवास कर रहे हैं, वहां इस तरह की आपदाएं और भी सामान्य होती जा रही हैं।

भविष्य की दिशा

इस अध्ययन के निष्कर्ष हमारे लिए स्पष्ट संदेश हैं कि हमें इस ‘धीमी आपदा’ पर ध्यान देने की जरूरत है। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और बढ़ सकती है, जिससे नुकसान की संभावना और भी बढ़ जाएगी।
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