ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। इसी बीच अमेरिका ने भारत को 30 दिनों तक रूस से तेल खरीदने की अस्थायी छूट दी है। अमेरिकी ऊर्जा मंत्री ने कहा कि यह कदम तेल बाजार पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए उठाया गया है।
अमेरिका ने भारत को दी 30 दिन की अस्थायी छूट
ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। इस स्थिति को देखते हुए अमेरिका ने भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की अस्थायी छूट दी है। अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने एक समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह कदम अस्थायी और व्यावहारिक समाधान के रूप में उठाया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह रूस के प्रति अमेरिकी नीति में किसी बदलाव का संकेत नहीं है, बल्कि मौजूदा हालात से निपटने के लिए एक अल्पकालिक व्यवस्था है।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी देते हुए बताया कि अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिनों तक रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी है।
तेल बाजार पर बढ़ते दबाव को कम करने की रणनीति
क्रिस राइट ने कहा कि ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा है और बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि फिलहाल कम समय में ज्यादा तेल बाजार में लाना जरूरी है, ताकि कीमतों को नियंत्रित रखा जा सके। उनका कहना था कि दुनिया में लंबी अवधि के लिए तेल की आपूर्ति पर्याप्त है, लेकिन वर्तमान संकट के कारण कीमतों में अस्थायी उछाल देखा जा रहा है। राइट ने बताया कि रूस का काफी तेल पहले से ही दक्षिण एशिया के आसपास समुद्र में जहाजों में लदा हुआ है। ऐसे में अमेरिका ने भारत से संपर्क कर उस तेल को खरीदने और अपनी रिफाइनरियों तक लाने का सुझाव दिया।
इससे भारत में तुरंत आपूर्ति बढ़ेगी और अन्य देशों की रिफाइनरियों पर दबाव कम होगा।
समुद्र में मौजूद करोड़ों बैरल रूसी तेल
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक रूस का बड़ी मात्रा में कच्चा तेल पहले से ही समुद्र में मौजूद है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार रूस के एक करोड़ बैरल से ज्यादा कच्चे तेल की खरीद पहले ही हो चुकी है।
जहाज ट्रैकिंग आंकड़ों के अनुसार अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में टैंकरों पर लगभग 1.5 करोड़ बैरल रूसी तेल मौजूद है। इसके अलावा करीब 70 लाख बैरल तेल लेकर कुछ टैंकर सिंगापुर के पास खड़े हैं। यह पूरा तेल एक सप्ताह के भीतर भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच सकता है। इसके अलावा भूमध्य सागर और स्वेज नहर से भी कई टैंकर भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ रहे हैं। जहाज ट्रैकिंग फर्म केप्लर के मुताबिक कम से कम 18 जहाज यूराल्स ग्रेड का रूसी तेल लेकर भारत की ओर जा रहे हैं।
भारतीय रिफाइनरियां फिर सक्रिय
रिपोर्टों के अनुसार भारत की सरकारी और निजी रिफाइनरियां भी रूसी तेल की खरीद के लिए फिर सक्रिय हो गई हैं। मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियां दिसंबर के बाद पहली बार बाजार में रूसी तेल खरीदने के लिए उतरी हैं। वहीं निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज भी घरेलू ईंधन उत्पादन के लिए रूसी तेल खरीदने की कोशिश कर रही है।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर खरीद इसी तरह जारी रही तो रूस से भारत का तेल आयात फिर से बढ़कर प्रतिदिन 20 लाख बैरल से अधिक तक पहुंच सकता है। पिछले महीने यह घटकर लगभग 10.6 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था, जो सितंबर 2022 के बाद सबसे कम स्तर था।
होर्मुज जलडमरूमध्य संकट से बढ़ी चिंता
मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष का सबसे बड़ा असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर पड़ा है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है। अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद ईरान ने इस जलमार्ग को बंद करने की चेतावनी दी है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कहा है कि जरूरत पड़ने पर इस रास्ते को पूरी तरह बंद किया जा सकता है। इस संकट के कारण कई तेल और गैस क्षेत्रों का संचालन भी प्रभावित हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि होर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों को अमेरिकी नौसेना सुरक्षा प्रदान करेगी। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा सैन्य तनाव के बीच यह कदम व्यावहारिक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
यही कारण है कि वैश्विक तेल बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। एक थिंक टैंक के अनुसार हाल ही में कच्चे तेल की कीमत 92 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है, जबकि संघर्ष शुरू होने से पहले यह करीब 70 डॉलर प्रति बैरल थी। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ता है तो इसका असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और तेल कीमतों पर पड़ सकता है।