UN में दहाड़, चीन को उसी की भाषा में जवाब, क्या है जयशंकर डॉक्ट्रिन, कैसे अपनी शर्तों पर बढ़ रहा भारत

The CSR Journal Magazine

भारत की कूटनीति में बड़ा मोड़: ‘जयशंकर डॉक्ट्रिन’ और UN में चीन को जवाब

वैश्विक कूटनीति के गलियारों में इन दिनों एक नया शब्द तेजी से गूंज रहा है—’जयशंकर डॉक्ट्रिन’। संयुक्त राष्ट्र (UN) के मंच से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक, भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने जिस आक्रामक और स्पष्ट शैली में भारत का पक्ष रखा है, उसने दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों को हैरान कर दिया है। चाहे यूक्रेन युद्ध पर पश्चिमी देशों का दबाव हो या वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की विस्तारवादी नीतियां, भारत अब रक्षात्मक होने के बजाय सामने वाले को उसी की भाषा में दो-टूक जवाब दे रहा है। यह बदलती विदेश नीति इस बात का प्रमाण है कि भारत अब किसी महाशक्ति के प्रभाव में काम नहीं करता, बल्कि अपनी शर्तों पर वैश्विक पटल पर आगे बढ़ रहा है।

क्या है ‘जयशंकर डॉक्ट्रिन’?

सरल शब्दों में कहें तो ‘जयशंकर डॉक्ट्रिन’ भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) और ‘राष्ट्र प्रथम’ (Nation First) की नीति का व्यावहारिक रूप है। आजादी के बाद लंबे समय तक भारत की विदेश नीति ‘गुटनिरपेक्षता’ (Non-Alignment) पर आधारित थी, जिसे अक्सर वैश्विक मुद्दों पर चुप्पी या संकोच के रूप में देखा जाता था। लेकिन जयशंकर डॉक्ट्रिन इस संकोच को पूरी तरह खारिज करता है। इसके मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं-
आक्रामक यथार्थवाद (Aggressive Realism): भारत अब विवादों से बचता नहीं है। अगर कोई देश भारत के हितों को चोट पहुंचाएगा, तो भारत वैश्विक मंचों पर उसका खुलकर विरोध करेगा।
मल्टी-अलाइनमेंट (Multi-Alignment): भारत किसी एक गुट (जैसे अमेरिका या रूस) का हिस्सा नहीं बनेगा। भारत अमेरिका के साथ क्वाड (QUAD) में भी शामिल रहेगा और रूस के साथ अपने पुराने संबंधों को भी निभाएगा।
पश्चिमी पाखंड को चुनौती: पश्चिमी देशों के इस रवैये को कि “यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं”, भारत ने कड़े शब्दों में खारिज किया है।

चीन को उसी की भाषा में जवाब

इस डॉक्ट्रिन का सबसे बड़ा असर चीन के साथ संबंधों पर दिखाई दिया है। अतीत में भारत अक्सर चीन को नाराज करने से बचता था, लेकिन जयशंकर के नेतृत्व में भारत ने साफ कर दिया है कि “सीमा पर शांति के बिना द्विपक्षीय संबंध सामान्य नहीं हो सकते।”UN के मंचों से लेकर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों तक, भारत ने चीन की विस्तारवादी सोच और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत देशों को कर्ज के जाल में फंसाने की नीति पर तीखे हमले किए हैं। भारत ने न केवल सैन्य स्तर पर चीन को एलएसी पर करारा जवाब दिया है, बल्कि आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर भी चीन की घेराबंदी मजबूत की है।

UN में दहाड़: अपनी शर्तों पर बढ़ता भारत

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में भारत का हालिया रुख यह दिखाता है कि भारत अब सिर्फ एक सदस्य देश नहीं, बल्कि वैश्विक एजेंडा तय करने वाला देश बन चुका है। आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान और उसे संरक्षण देने वाले चीन को जयशंकर ने बेनकाब किया है। यूक्रेन संकट के दौरान जब अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भारत पर रूस से कच्चा तेल न खरीदने का भारी दबाव बनाया, तब भारत ने स्पष्ट किया कि सरकार का पहला कर्तव्य अपने नागरिकों को सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराना है। पश्चिमी प्रतिबंधों की परवाह किए बिना भारत ने रूस से तेल खरीदा और अपने आर्थिक हितों की रक्षा की। यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि भारत अब किसी के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर फैसले लेता है।

भारत बना अग्रणी शक्ति

‘जयशंकर डॉक्ट्रिन’ ने भारत को एक ‘संतुलन बनाने वाली शक्ति’ (Balancing Power) से उठाकर एक ‘अग्रणी शक्ति’ (Leading Power) के रूप में स्थापित कर दिया है। यह एक नए, आत्मनिर्भर और आत्मविश्वास से भरे भारत की कहानी है, जो दुनिया की आंखों में आंखें डालकर अपने हक की बात करना जानता है।

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