तुर्की-पाकिस्तान का ‘मक्का पैक्ट’: क्या भारत के IMEC प्रोजेक्ट को टक्कर देने की तैयारी में नया मुस्लिम गठबंधन?

The CSR Journal Magazine

मक्का पैक्ट और IMEC का मुकाबला

रियाद और नई दिल्ली से एक नई रणनीतिक प्रतिस्पर्धा की खबर आ रही है। तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने मिलकर ‘मक्का पैक्ट’ बनाया है, जो ग्वादर पोर्ट से लेकर गोल्डन हॉर्न तक फैला है। वहीं, भारत का ‘इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप आर्थिक गलियारा’ (IMEC) पुणे से लेकर ग्रीस के पिरेउस तक विस्तारित है। IMEC में भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन, इजरायल और यूरोप शामिल हैं।

तुर्की की चिंता और IMEC का महत्व

तुर्की को IMEC से परेशानी इस बात की है कि उसे इस परियोजना से बाहर रखा गया है। सऊदी अरब, जो मक्का पैक्ट का हिस्सा है, IMEC में भी शामिल है। हडसन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो केन मोरियासु के अनुसार, ‘मक्का पैक्ट’ और ‘IMEC’ के बीच की प्रतिस्पर्धा में यही मुख्य रणनीतिक सवाल है। उन्होंने कहा कि यह गठबंधन भारत, ईरान और इजरायल को मध्य पूर्व से बाहर रखने के लिए बनाया गया है।

क्षेत्रीय संघर्ष और तुर्की-इजरायल की प्रतिद्वंद्विता

मोरियासु ने यह भी कहा कि मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष की जड़ें ईरान युद्ध के बाद तुर्की और इजरायल के बीच की प्रतिद्वंद्विता में हैं। उन्होंने यह सवाल उठाया कि यह मुकाबला केवल मध्य पूर्व के प्रमुख खिलाड़ियों के बीच नहीं होगा, बल्कि इसके आसपास के देशों, खासकर दक्षिण काकेशस और मध्य एशिया के ‘स्विंग स्टेट्स’ भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

अजरबैजान में दिलचस्प घटनाक्रम

15 अक्टूबर को अजरबैजान की राजधानी बाकू में एक क्षेत्रीय सम्मेलन के दौरान एक दिलचस्प घटना घटी। जब इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने अपने भाषण की शुरुआत की, तुर्की के विदेश मंत्री हकन फिदान वहां से बाहर निकल गए। उनके पीछे ईरान, पाकिस्तान, कुवैत, सऊदी अरब और फिलीस्तीन प्राधिकरण के अधिकारी भी बाहर चले गए। लेकिन अजरबैजान के अधिकारी वहीं बने रहे।

मध्य एशिया का रुख

इस घटना ने यह साफ कर दिया कि मध्य एशिया तुर्की के इशारों पर नहीं चलेगा। कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव ने इजरायली राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय बैठक की, जिससे तुर्की की स्थिति और कमजोर हुई। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि IMEC अभी भी सक्रिय है।

अमेरिका का प्रभाव और मक्का पैक्ट

हडसन इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि मध्य पूर्व एक ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है जहां अमेरिका का प्रभाव लगातार कमजोर हो रहा है। ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन की एसली आयदिनताशबाश ने कहा कि मक्का पैक्ट अमेरिका के बाद मध्य पूर्व को संभालने का पहला प्रयोग हो सकता है।

भारत की भूमिका

वाशिंगटन इंस्टीट्यूट फॉर नियर ईस्ट पॉलिसी के सोनार कागाप्टे ने सुझाव दिया कि मक्का पैक्ट को उन देशों के माध्यम से समझा जा सकता है जिन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि ‘I’ अक्षर से शुरू होने वाले देशों, यानी भारत, ईरान और इजरायल को इस समझौते का हिस्सा नहीं बनाया गया है।

भविष्य की रणनीतियाँ

विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य पूर्व में दो तरह के प्रोजेक्ट उभर रहे हैं। एक मक्का पैक्ट है और दूसरा IMEC। यह स्पष्ट है कि भविष्य की क्षेत्रीय व्यवस्था केवल शक्तिशाली सदस्यों की संख्या से तय नहीं होगी, बल्कि दक्षिण काकेशस और मध्य एशिया के ‘स्विंग स्टेट्स’ भी इस स्थिति को प्रभावित करेंगे।

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