भारत और अमेरिका के बीच घोषित नई ट्रेड डील से रिश्तों में सुधार की उम्मीद जगी है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावों और भारत सरकार की चुप्पी ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। रूस से तेल ख़रीद, 500 अरब डॉलर के आयात और ज़ीरो टैरिफ जैसे मुद्दों पर असमंजस बना हुआ है।
क्या रूस से तेल ख़रीदना बंद करेगा भारत?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा और अमेरिकी तेल के आयात को बढ़ाएगा। यह बयान भारत के उस पुराने रुख़ के उलट है जिसमें सरकार ने साफ़ कहा था कि ऊर्जा सुरक्षा उसके संप्रभु फ़ैसलों का हिस्सा है। रूस से सस्ता कच्चा तेल भारत के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी रहा है और इससे महंगाई पर नियंत्रण में मदद मिली है। अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर बिस्वजीत धर मानते हैं कि यदि यह दावा सही है तो यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर बड़ा समझौता होगा। हालांकि सरकार की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि या खंडन न आने से स्थिति अस्पष्ट बनी हुई है।
500 अरब डॉलर के आयात का दावा कितना व्यवहारिक?
ट्रंप का दूसरा बड़ा दावा है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर मूल्य के ऊर्जा, तकनीक और कृषि उत्पाद खरीदेगा। जबकि मौजूदा समय में भारत का कुल अमेरिकी आयात करीब 50 अरब डॉलर के आसपास है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि तक पहुंचने में दशकों का समय लग सकता है। पूर्व राजनयिक मोहन कुमार के अनुसार, यह आंकड़ा संभवत लंबी समय-सीमा में “गोइंग फॉरवर्ड” के संदर्भ में कहा गया है।
बिना किसी तय अवधि और औपचारिक दस्तावेज़ के, इस दावे को सीधे स्वीकार करना मुश्किल है।
कृषि और खाद्य सुरक्षा पर मंडराता संकट
ट्रंप के बयानों में कृषि आयात का ज़िक्र सबसे संवेदनशील मुद्दा माना जा रहा है। भारत लंबे समय से अपने किसानों और खाद्य सुरक्षा को लेकर सतर्क रहा है।
प्रोफ़ेसर धर के अनुसार, 1960 के दशक में खाद्यान्न आयात पर निर्भरता के अनुभव से भारत ने आत्मनिर्भर बनने का सबक़ लिया था। अब अगर अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए बाज़ार खोला गया, तो छोटे किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है। हालांकि वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने आश्वासन दिया है कि कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षण दिया गया है और अंतिम समझौते के बाद ही पूरी तस्वीर साफ़ होगी।


