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February 4, 2026

ट्रंप के दावे बनाम भारत की खामोशी ट्रेड डील पर उठे संप्रभुता, कृषि और टैरिफ के बड़े सवाल

The CSR Journal Magazine
भारत और अमेरिका के बीच घोषित नई ट्रेड डील से रिश्तों में सुधार की उम्मीद जगी है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावों और भारत सरकार की चुप्पी ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। रूस से तेल ख़रीद, 500 अरब डॉलर के आयात और ज़ीरो टैरिफ जैसे मुद्दों पर असमंजस बना हुआ है।

क्या रूस से तेल ख़रीदना बंद करेगा भारत?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा और अमेरिकी तेल के आयात को बढ़ाएगा। यह बयान भारत के उस पुराने रुख़ के उलट है जिसमें सरकार ने साफ़ कहा था कि ऊर्जा सुरक्षा उसके संप्रभु फ़ैसलों का हिस्सा है। रूस से सस्ता कच्चा तेल भारत के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी रहा है और इससे महंगाई पर नियंत्रण में मदद मिली है। अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर बिस्वजीत धर मानते हैं कि यदि यह दावा सही है तो यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर बड़ा समझौता होगा। हालांकि सरकार की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि या खंडन न आने से स्थिति अस्पष्ट बनी हुई है।

500 अरब डॉलर के आयात का दावा कितना व्यवहारिक?

ट्रंप का दूसरा बड़ा दावा है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर मूल्य के ऊर्जा, तकनीक और कृषि उत्पाद खरीदेगा। जबकि मौजूदा समय में भारत का कुल अमेरिकी आयात करीब 50 अरब डॉलर के आसपास है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि तक पहुंचने में दशकों का समय लग सकता है। पूर्व राजनयिक मोहन कुमार के अनुसार, यह आंकड़ा संभवत लंबी समय-सीमा में “गोइंग फॉरवर्ड” के संदर्भ में कहा गया है।
बिना किसी तय अवधि और औपचारिक दस्तावेज़ के, इस दावे को सीधे स्वीकार करना मुश्किल है।

कृषि और खाद्य सुरक्षा पर मंडराता संकट

ट्रंप के बयानों में कृषि आयात का ज़िक्र सबसे संवेदनशील मुद्दा माना जा रहा है। भारत लंबे समय से अपने किसानों और खाद्य सुरक्षा को लेकर सतर्क रहा है।
प्रोफ़ेसर धर के अनुसार, 1960 के दशक में खाद्यान्न आयात पर निर्भरता के अनुभव से भारत ने आत्मनिर्भर बनने का सबक़ लिया था। अब अगर अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए बाज़ार खोला गया, तो छोटे किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है। हालांकि वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने आश्वासन दिया है कि कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षण दिया गया है और अंतिम समझौते के बाद ही पूरी तस्वीर साफ़ होगी।

ज़ीरो टैरिफ का वादा और एमएसएमई पर असर

ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर सभी टैरिफ और ग़ैर-टैरिफ बाधाएं हटाकर उन्हें शून्य कर देगा। भारत परंपरागत रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में ऊंचे टैरिफ लगाता रहा है ताकि घरेलू उद्योग, विशेषकर एमएसएमई, सुरक्षित रहें।
यदि अमेरिकी उत्पाद सस्ते दामों पर भारतीय बाज़ार में प्रवेश करते हैं, तो छोटे और मझोले उद्योगों के लिए प्रतिस्पर्धा बेहद कठिन हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह रुख़ भारत की पहले अपनाई गई संरक्षणवादी नीति से बिल्कुल उलट होगा।

भारत-रूस रिश्तों और रणनीतिक स्वायत्तता पर दबाव

ऊर्जा और व्यापार से आगे यह डील भारत-रूस संबंधों को भी प्रभावित कर सकती है। रक्षा क्षेत्र में रूस लंबे समय से भारत का प्रमुख साझेदार रहा है, हालांकि हाल के वर्षों में यह निर्भरता कम हुई है। ट्रंप पहले भी भारत और रूस की नज़दीकियों पर कड़ा रुख़ दिखा चुके हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी दबाव में भारत यदि अपने पारंपरिक साझेदारों से दूरी बनाता है, तो उसकी बहु-ध्रुवीय विदेश नीति कमजोर पड़ सकती है।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील फिलहाल उम्मीद और आशंकाओं के बीच खड़ी है। ट्रंप के दावे बड़े हैं, लेकिन भारत सरकार की चुप्पी ने अनिश्चितता बढ़ा दी है। जब तक आधिकारिक दस्तावेज़ और स्पष्ट शर्तें सामने नहीं आतीं, तब तक यह तय कर पाना मुश्किल है कि यह समझौता भारत के हित में है या रणनीतिक स्वायत्तता पर आंच डालने वाला कदम।

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