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January 23, 2026

ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ और पाकिस्तान कूटनीतिक दांव या सिद्धांतों से समझौता?

The CSR Journal Magazine
डोनाल्ड ट्रंप के प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ में पाकिस्तान की भागीदारी ने वहां राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में तीखी बहस छेड़ दी है। जहां सरकार इसे वैश्विक मंच पर प्रासंगिक बने रहने और ग़ज़ा में शांति प्रयासों में भूमिका बढ़ाने का अवसर बता रही है, वहीं आलोचक इसे पाकिस्तान की पारंपरिक विदेश नीति और फ़लस्तीन समर्थक रुख़ से विचलन मान रहे हैं। इसी द्वंद्व ने पाकिस्तान में राय को दो हिस्सों में बांट दिया है।

पाकिस्तान का फ़ैसला क्यों चौंकाने वाला है

पाकिस्तान दशकों से फ़लस्तीन और ग़ज़ा के मुद्दे पर खुलकर उनके समर्थन में खड़ा रहा है। इसराइल को आज तक औपचारिक मान्यता न देने वाले पाकिस्तान का ऐसे मंच में शामिल होना, जिसमें इसराइल भी सदस्य है, कई लोगों को असहज कर रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक, यह फ़ैसला इसलिए भी हैरान करता है क्योंकि ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ को संयुक्त राष्ट्र के समानांतर और ट्रंप-केंद्रित पहल के रूप में देखा जा रहा है। पूर्व राजनयिक मलीहा लोधी समेत कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह संगठन न तो दीर्घकालिक दिखता है और न ही बहुपक्षीय संतुलन को मज़बूत करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान ने सिद्धांतों से ज़्यादा रणनीतिक लाभ को तवज्जो दी है?

सरकार का तर्क रणनीति और प्रासंगिकता

पाकिस्तानी सरकार का कहना है कि बोर्ड में शामिल होना व्यावहारिक कूटनीति का हिस्सा है। उसके अनुसार, इस मंच के ज़रिये ग़ज़ा में स्थायी युद्धविराम, मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाया जा सकता है। सरकारी हलकों का तर्क है कि वैश्विक राजनीति में तटस्थ रहना अब अप्रासंगिक होने जैसा है। बोर्ड की सदस्यता से पाकिस्तान को अमेरिका और मध्य पूर्व के अहम खिलाड़ियों के साथ सीधा संवाद करने का अवसर मिलेगा। कुछ विश्लेषक इसे पाकिस्तान की “ग्लोबल विज़िबिलिटी” बढ़ाने की कोशिश भी मानते हैं, ताकि वह खुद को एक जिम्मेदार शांति-स्थापना करने वाले देश के रूप में पेश कर सके।

विपक्ष और आलोचकों की आपत्तियाँ

विपक्षी दलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कई बुद्धिजीवियों ने इस फ़ैसले की कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि बिना संसद में बहस और जनमत लिए ऐसा निर्णय लोकतांत्रिक मूल्यों के ख़िलाफ़ है। आलोचकों के अनुसार, ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ एक ऐसा ढांचा है जिसमें सत्ता कुछ अमीर और ताक़तवर देशों तक सीमित है, जबकि आम फ़लस्तीनियों की आवाज़ हाशिये पर चली जाती है। सीनेटर मुस्तफ़ा नवाज़ खोखर और एमडब्ल्यूएम नेता अल्लामा राजा नासिर अब्बास जाफ़री जैसे नेताओं ने इसे संयुक्त राष्ट्र को कमज़ोर करने और अंतरराष्ट्रीय क़ानून की अनदेखी करने वाली पहल बताया है। उनका मानना है कि पाकिस्तान, जो खुद कश्मीर जैसे मुद्दों पर यूएन और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भरोसा करता है, उसे ऐसे किसी वैकल्पिक ढांचे का समर्थन नहीं करना चाहिए।

अमेरिका से नज़दीकी और इसके मायने

पाकिस्तान का यह कदम सिर्फ़ ग़ज़ा तक सीमित नहीं माना जा रहा। पिछले कुछ समय में ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करने की सिफ़ारिश और आईएसएफ़ में शामिल होने पर विचार जैसे फ़ैसले भी इसी कड़ी के रूप में देखे जा रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा पाकिस्तानी शासन अमेरिका के साथ रिश्ते मज़बूत करना चाहता है, क्योंकि आर्थिक संकट, आईएमएफ़ और फ़ैटफ़ जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसे पश्चिमी समर्थन की ज़रूरत है। इमरान ख़ान के दौर में चीन और रूस से बढ़ी नज़दीकियों के बाद अब सत्ता प्रतिष्ठान फिर से वॉशिंगटन की ओर झुकता दिखाई दे रहा है। हालांकि, कई जानकार चेतावनी देते हैं कि पाकिस्तान-अमेरिका रिश्ते ऐतिहासिक रूप से अस्थिर रहे हैं और केवल ‘ट्रंप को ख़ुश करने’ की नीति लंबे समय में जोखिम भरी साबित हो सकती है।

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