बांग्लादेश में हालिया आम चुनावों के बाद राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। शेख़ हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग के चुनाव में हिस्सा न लेने से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को बढ़त मिली है और तारिक़ रहमान के प्रधानमंत्री बनने की संभावना मजबूत हुई है। बदलते हालात में भारत का रुख भी लचीला नजर आ रहा है, जिसे रणनीतिक दृष्टि से व्यावहारिक कदम माना जा रहा है।
मोदी की बधाई और कूटनीतिक संकेत
13 फ़रवरी की सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीएनपी की चुनावी बढ़त पर सोशल मीडिया मंच एक्स के माध्यम से बधाई संदेश दिया। उन्होंने लिखा कि यह जीत बांग्लादेश की जनता के आपके नेतृत्व पर भरोसे को दर्शाती है। कुछ ही देर बाद यह संदेश बंगाली भाषा में भी साझा किया गया, जिससे यह स्पष्ट संकेत मिला कि भारत नई राजनीतिक परिस्थिति को स्वीकार कर रहा है। अब तक भारत की परंपरा रही है कि वह बांग्लादेश में घोषित चुनाव परिणामों के बाद विजयी दल को शीघ्र बधाई देता रहा है—चाहे केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार रही हो या नरेंद्र मोदी की। लेकिन इस बार की बधाई को विशेष महत्व इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि राजनीतिक सत्ता समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं।
अवामी लीग की अनुपस्थिति और बदलता परिदृश्य
लगातार चार बार चुनाव जीतने वाली शेख़ हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने इस बार चुनाव में भाग नहीं लिया। इससे बीएनपी को सत्ता में आने का अवसर मिला। बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक़ रहमान, जो वर्षों से लंदन में निर्वासन में रह रहे थे, अब बांग्लादेश की राजनीति के केंद्र में हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बीएनपी की स्थिर और मजबूत सरकार भारत के लिए फिलहाल सबसे व्यवहारिक विकल्प है। भारत लंबे समय तक अवामी लीग के साथ करीबी संबंध रखता आया है, लेकिन मौजूदा स्थिति में वह पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर नई सरकार के साथ व्यावहारिक संबंध स्थापित करना चाहता है।
पुराने मतभेदों से आगे बढ़ने की रणनीति
बीएनपी और भारतीय जनता पार्टी की विचारधाराओं में कई समानताएं मानी जाती हैं। दोनों दलों को मध्य-दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से देखा जाता है। जब 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया, तब यह उम्मीद जताई गई थी कि बीएनपी के साथ स्वाभाविक राजनीतिक जुड़ाव बन सकता है।
हालांकि उस समय संबंधों में विशेष प्रगति नहीं हो सकी। रहमान की ओर से प्रधानमंत्री मोदी को उपहार भेजा गया और अनौपचारिक संपर्कों के प्रयास भी हुए, लेकिन सार्वजनिक स्तर पर परिणाम सामने नहीं आए। कुछ जानकारों का कहना है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की सावधानीपूर्ण सलाह के चलते दिल्ली ने दूरी बनाए रखी। ढाका में भारत के पूर्व उच्चायुक्त पिनाक रंजन चक्रवर्ती के अनुसार, उस समय शेख़ हसीना भारत और बीएनपी के बीच किसी भी संपर्क को लेकर संवेदनशील थीं। इस कारण भारत ने औपचारिक चैनलों के बजाय ‘ट्रैक-टू’ कूटनीति का सहारा लिया, जिसमें थिंक टैंक, सेवानिवृत्त राजनयिक और सुरक्षा अधिकारी शामिल थे।
नई सरकार से अपेक्षाएं और चुनौतियां
भारतीय विदेश मंत्रालय ने संकेत दिया है कि नई सरकार के साथ संबंध मुद्दा-आधारित होंगे। भारत की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण चिंता बनी रहेगी। सत्तारूढ़ बीजेपी ने दोहराया है कि किसी भी सरकार के साथ संबंध इन पहलुओं से अछूते नहीं रह सकते। इसके बावजूद भारत निर्वाचित राजनीतिक सरकार की वापसी का स्वागत कर रहा है। क्षेत्रीय स्थिरता, सीमाई सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और आर्थिक साझेदारी जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं।

