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March 5, 2026

ब्रिटेन से वापस आएगी 500 साल पुरानी ये खास मूर्ति, तमिलनाडु के मंदिर में होगी स्थापित

The CSR Journal Magazine

श्री सौंदरराजा पेरुमल मंदिर की गर्वित वापसी

ब्रिटेन के एशमोलियन म्यूजियम ने 16वीं सदी की थिरुमंगई आळवार की कांस्य मूर्ति भारत को वापस लौटा दी है। यह 500 साल पुरानी मूर्ति अब तमिलनाडु के थाडिकोम्बु स्थित श्री सौंदरराजा पेरुमल मंदिर में पुनः स्थापित होने जा रही है। इस मूर्ति की पहचान 2019 में हुई थी, जिसके बाद म्यूजियम ने भारतीय अधिकारियों से संपर्क किया।

वापसी की यात्रा का खास सफर

यह मूर्ति 1967 में सोथबीज़ द्वारा खरीदी गई थी। साल 2019 में एक रिसर्चर ने बताया कि यह मूर्ति थाडिकोम्बु के श्री सौंदरराजा पेरुमल मंदिर की है। जानकारी सामने आने के बाद म्यूजियम ने भारतीय उच्चायोग से संपर्क किया और इससे जुड़ी जानकारी मांगी। जांच के बाद यह साबित हुआ कि यह मूर्ति निश्चित रूप से तमिलनाडु की है।

औपचारिक समारोह में सौंपने की प्रक्रिया

मूर्ति को लंदन स्थित इंडिया हाउस में औपचारिक समारोह के दौरान भारत को सौंपा गया। म्यूजियम के निदेशक डॉ. ज़ा स्टर्गिस ने स्पष्ट किया कि उन्हें पांच साल पहले इस मूर्ति के बारे में पता चला था। उन्होंने कहा कि मूर्ति की पुरानी तस्वीरों से यह साबित होता है कि यह मंदिर से चोरी की गई है। इसी समय यह तय किया गया कि इसे सही तरीके से भारत को वापस किया जाएगा।

पुनः स्थापना के लिए आगे की प्रक्रिया

मूर्ति से संबंधित हर छोटी जांच की गई। Archaeological Survey of India (ASI), तमिलनाडु सरकार, और मंदिर प्रशासन ने इसकी पहचान की पुष्टि की। सभी जांच के बाद यह निर्णय लिया गया कि भारत को इस मूर्ति को वापस किया जाना चाहिए। भारत पहुंचने पर ASI इसकी जांच करेगा और फिर इसे मंदिर में पुनः स्थापित किया जाएगा।

ऐशमोलियन म्यूज़ियम का अनूठा कदम

ऐशमोलियन म्यूज़ियम हमेशा से अपने म्यूजियम में कई अनमोल वस्तुएं रखने के लिए जाना जाता रहा है। हालांकि, आज तक किसी देश को उसकी वस्तुएं लौटाई नहीं गई थीं। यह पहली बार है जब ऐशमोलियन म्यूज़ियम ने किसी वस्तु को उसके मूल देश को वापस किया है, जिससे यह एक ऐतिहासिक क्षण बन गया है।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

हाउस ऑफ लॉर्ड्स की सदस्य बैरोनेस थंगम डेबोननेयर ने इस मूर्ति को सिर्फ एक कला का नमूना नहीं, बल्कि एक जीवित मंदिर की पवित्र मूर्ति बताया। इस समारोह में चार और भारतीय प्राचीन वस्तुएं भी भारत को सौंपी गईं। यह वापसी न केवल भारतीय संस्कृति की धरोहर को मान्यता देती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी मजबूती लाती है।

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