धरती की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने में केंचुआ सबसे अहम भूमिका निभाता है। रासायनिक खेती और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से केंचुओं की संख्या घट रही है, जिसका सीधा असर मिट्टी की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि “केंचुआ है तो खेत की हेल्थ ठीक है” क्योंकि यही जीव प्राकृतिक रूप से मिट्टी को उपजाऊ बनाता है, जैविक खाद तैयार करता है और किसानों के लिए आजीविका का नया रास्ता भी खोल रहा है।
क्या है केंचुआ और क्यों इसे ‘धरती का इंजीनियर’ कहा जाता है?
केंचुआ एक साधारण दिखने वाला लेकिन बेहद उपयोगी जीव है, जो मिट्टी के भीतर रहता है। यह मिट्टी में सुरंग बनाकर हवा और पानी के संचार को आसान बनाता है। इसी कारण वैज्ञानिक इसे “धरती का इंजीनियर” कहते हैं।
केंचुआ मिट्टी में मौजूद सूखे पत्तों और जैविक अवशेषों को खाकर उन्हें पौधों के लिए पोषक तत्वों में बदल देता है। उसकी मल-त्याग प्रक्रिया से निकलने वाली वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी के लिए प्राकृतिक खाद का काम करती है।
कैसे बनाता है केंचुआ धरती को उपजाऊ?
केंचुआ जब मिट्टी में चलता है तो वह उसे भुरभुरी बना देता है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है और पौधों की जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जहां केंचुओं की संख्या अधिक होती है, वहां मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे तत्व संतुलित मात्रा में पाए जाते हैं। केंचुआ मिट्टी की ऊपरी और निचली परतों को मिलाता है, जिससे पोषक तत्वों का प्राकृतिक संतुलन बना रहता है। यही कारण है कि जैविक खेती में केंचुओं की उपस्थिति को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
खेत में केंचुआ रहने के फायदे
1. मिट्टी की संरचना मजबूत होती है
2. फसल की पैदावार बढ़ती है
3. रासायनिक खाद की आवश्यकता कम होती है
4. पौधों की जड़ें गहरी और मजबूत बनती हैं
5. पानी की बचत होती है
कृषि वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर खेत में केंचुए दिखाई दें तो यह संकेत है कि मिट्टी स्वस्थ है। स्वस्थ मिट्टी से ही पौष्टिक अनाज और सब्जियां मिलती हैं, जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी हैं।
कीटनाशकों के छिड़काव से गायब होते केंचुए
आधुनिक खेती में रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से केंचुओं की संख्या तेजी से घट रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब खेत में बार-बार पेस्टीसाइड का छिड़काव किया जाता है तो केंचुए मर जाते हैं या जमीन छोड़कर चले जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि मिट्टी सख्त और बंजर होने लगती है। लंबे समय में किसान को अधिक रासायनिक खाद डालनी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ती है और मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता घटती जाती है।
ऑर्गेनिक खाद और केंचुआ किसानों के लिए नया व्यवसाय
आज वर्मी कम्पोस्ट यानी केंचुआ खाद की मांग तेजी से बढ़ रही है।
गांवों में कई किसान और युवा केंचुआ पालन कर जैविक खाद तैयार कर रहे हैं और इसे बाजार में बेचकर अच्छी आमदनी कमा रहे हैं। केंचुआ खाद बनाने की प्रक्रिया सरल है। गोबर, सूखे पत्ते और जैविक कचरे को एक गड्ढे या टंकी में डालकर उसमें केंचुए छोड़े जाते हैं। कुछ ही हफ्तों में यह मिश्रण उच्च गुणवत्ता वाली खाद में बदल जाता है। यह खाद मिट्टी की गुणवत्ता सुधारती है और फसलों की पैदावार बढ़ाती है। इससे किसानों को दोहरा फायदा मिलता है, खेत की सेहत भी बेहतर और अतिरिक्त आय भी।
पॉलीहाउस के दौर में भी केंचुओं की अहमियत
आज के दौर में कई किसान पॉलीहाउस तकनीक से सब्जियां उगा रहे हैं। नियंत्रित वातावरण में उगाई गई सब्जियां बाजार में अच्छे दाम पर बिकती हैं। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि चाहे खुला खेत हो या पॉलीहाउस, मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए केंचुओं की भूमिका अहम है। अगर मिट्टी में जैविक तत्व और केंचुए मौजूद हैं तो उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर रहती है। इससे रासायनिक निर्भरता घटती है और सब्जियां अधिक सुरक्षित व पौष्टिक बनती हैं।
केंचुआ है तो खेत की हेल्थ ठीक है
कृषि विशेषज्ञों का साफ कहना है कि स्वस्थ मिट्टी, स्वस्थ फसल और स्वस्थ इंसान इन तीनों के बीच सीधा संबंध है। अगर खेत में केंचुए हैं तो इसका मतलब मिट्टी जिंदा है। और जिंदा मिट्टी ही किसानों की असली पूंजी है। आज जरूरत है कि किसान रासायनिक खेती से थोड़ा हटकर जैविक और प्राकृतिक तरीकों को अपनाएं, ताकि केंचुओं की संख्या बढ़े और धरती की उर्वरता बनी रहे।
“केंचुआ है तो खेत की सेहत ठीक है, और खेत स्वस्थ है तो जीवन सुरक्षित है।”

