सीकर के चर्चित पूर्व सरपंच सरदार राव हत्याकांड में 9 साल की लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट ने गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई को बरी कर दिया, जबकि 9 अन्य आरोपियों को सजा सुनाई गई। अदालत ने अपने 146 पेज के फैसले में साफ कहा कि पुलिस और प्रॉसीक्यूशन लॉरेंस के खिलाफ ठोस और निर्णायक सबूत पेश करने में नाकाम रहे। फोन, पैसों का लेनदेन, एफएसएल रिपोर्ट और गवाह—हर मोर्चे पर जांच कमजोर पड़ी, जिसका सीधा फायदा लॉरेंस को मिला।
जेल से साजिश का दावा, लेकिन फोन का कोई सबूत नहीं
पुलिस का दावा था कि लॉरेंस बिश्नोई ने अजमेर की हाई-सिक्योरिटी जेल में रहते हुए मोबाइल फोन से शूटरों को निर्देश दिए। लेकिन जांच के दौरान न तो लॉरेंस से कोई मोबाइल फोन बरामद हुआ और न ही ऐसा कोई उपकरण मिला, जिससे यह साबित हो सके कि वह जेल से बाहर संपर्क में था। अदालत ने माना कि बिना फोन रिकवरी के यह आरोप सिर्फ अनुमान पर आधारित है।

कॉल डिटेल और नंबर की कड़ी नहीं जुड़ पाई
शूटर्स की गिरफ्तारी के बावजूद पुलिस यह साबित नहीं कर सकी कि वे जिस नंबर से बात कर रहे थे, वह लॉरेंस बिश्नोई का ही था। न तो कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) को प्रभावी तरीके से जोड़ा गया और न ही किसी तकनीकी साक्ष्य से यह स्थापित हो पाया कि लॉरेंस का सीधा संपर्क हत्यारों से था। कोर्ट ने इसे जांच की गंभीर कमी माना।
एफएसएल और वॉयस सैंपल की बड़ी चूक
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह के संगठित अपराध में फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की भूमिका अहम होती है। लेकिन इस केस में न तो कॉल रिकॉर्ड की एफएसएल रिपोर्ट पेश की गई और न ही लॉरेंस का वॉयस सैंपल लेकर किसी रिकॉर्डिंग से मिलान कराया गया। यहां तक कि पुराने मामलों का हवाला देने के बावजूद संबंधित गवाहों को कोर्ट में पेश नहीं किया गया।
पैसों की सुपारी और मोटिव साबित नहीं हुआ
पुलिस का आरोप था कि हत्या पैसों के बदले करवाई गई, लेकिन कोर्ट के सामने ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं रखा गया, जिससे यह साबित हो सके कि लॉरेंस ने इसके लिए कोई रकम ली या दी। न तो उसके पास से पैसे की बरामदगी हुई और न ही बैंक, नकद या किसी अन्य लेनदेन का रिकॉर्ड पेश किया गया। अदालत ने कहा कि बिना मोटिव साबित किए किसी को मास्टरमाइंड नहीं ठहराया जा सकता।
गवाहों के मुकरने से कमजोर पड़ा केस
जेल हॉस्पिटल में साजिश रचने की कहानी को मजबूत करने वाले नर्सिंग ऑफिसर राजवीर को अहम गवाह बनाया गया था। लेकिन सुनवाई के दौरान वह अपने बयान से मुकर गया और पक्षद्रोही घोषित हुआ। इसके अलावा सह-आरोपी यतेंद्रपाल उर्फ टोपी की भूमिका भी पुलिस स्पष्ट रूप से साबित नहीं कर पाई, जिससे लॉरेंस के खिलाफ साजिश की थ्योरी और कमजोर हो गई।
क्या था सरदार राव मर्डर केस?
23 अगस्त 2017 को सीकर में राजनीतिक रंजिश के चलते पूर्व सरपंच सरदार राव की किराने की दुकान में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि उपचुनाव से पहले वोटर लिस्ट विवाद और पुरानी दुश्मनी के कारण हरदेवा राम ने अपने भतीजे, आनंदपाल गैंग के सदस्य सुभाष बराल के जरिए हत्या की साजिश रची। पुलिस के अनुसार यह योजना अजमेर सेंट्रल जेल में बनी, जिसमें लॉरेंस बिश्नोई भी शामिल था।

कोर्ट का फैसला और आगे की जांच
कोर्ट ने सबूतों के आधार पर 3 आरोपियों को आजीवन कारावास और 6 को 10-10 साल की सजा सुनाई, जबकि लॉरेंस बिश्नोई और यतेंद्रपाल को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इस केस से जुड़े संपत नेहरा और जग्गू भगवानपुरिया समेत कुछ आरोपियों के खिलाफ अभी भी सीआरपीसी की धारा 173(8) के तहत जांच लंबित है।
सरदार राव हत्याकांड का फैसला यह दिखाता है कि संगठित अपराध के मामलों में केवल आरोप या कड़ियों की कहानी काफी नहीं होती। जब तक तकनीकी, फॉरेंसिक और प्रत्यक्ष सबूत मजबूत न हों, तब तक अदालत दोष सिद्ध करने से पीछे हटती है। इसी जांच की कमजोरियों ने लॉरेंस बिश्नोई को इस बड़े मामले में राहत दिला दी।

